प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा-डॉ. अमित भूषण द्विवेदी
प्रधानमंत्री उत्कृष्ट महाविद्यालय
शासकीय तुलसी महाविद्यालय, अनूपपुर (म.प्र.)
अर्थशास्त्र विभाग
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स्नातक प्रथम वर्ष
तृतीय प्रश्न-पत्र
मुख्य विषय : अर्थशास्त्र
ई-अध्ययन सामग्री
विद्यार्थियों हेतु नोट्स आधारित लेख
विषय |
पाठ्यक्रमानुकूल एवं परीक्षा उपयोगी अध्ययन सामग्री
प्रस्तुतकर्ता
डॉ. अमित भूषण द्विवेदी
सहायक प्राध्यापक, अर्थशास्त्र विभाग
प्रधानमंत्री उत्कृष्ट महाविद्यालय
शासकीय तुलसी महाविद्यालय, अनूपपुर (म.प्र.)
विद्यार्थियों के स्व-अध्ययन, पुनरावृत्ति, अवधारणात्मक समझ एवं परीक्षा तैयारी हेतु
प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा
1. अवधारणा, परिभाषा, सैद्धांतिक पृष्ठभूमि एवं
ऐतिहासिक कालक्रम (भारतवर्ष)
भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge Systems - IKS) भारत के प्राचीन एवं मध्यकालीन चिंतन, बौद्धिक संपदा, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा, खगोलशास्त्र, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला, साहित्य और शासन-व्यवस्था की एक समृद्ध, अखंड, अनवरत और प्रवाही धारा है। 'ज्ञान' का अर्थ जानकारी, बोध, समझ या सत्य का प्रत्यक्ष एवं प्रामाणिक अनुभव है, जबकि 'परंपरा' का अर्थ पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना टूटे आगे बढ़ने वाला प्रवाह है। इस प्रकार, ज्ञान परंपरा किसी समाज द्वारा अर्जित ज्ञान, अनुभव, कौशल, मूल्यों और परीक्षण-प्रक्रियाओं (प्रमाण) के उस संचित भंडार को दर्शाती है जो केवल तथ्यों का संग्रह न होकर व्यावहारिक अनुप्रयोग और समाज-कल्याण पर केंद्रित है। इस परंपरा का आरंभ मुख्य रूप से भाषा और लिपि के विकास के साथ हुआ, जिसने अमूर्त विचारों को संचित व मूर्त रूप दिया। ज्ञान हस्तांतरण मुख्यतः तीन माध्यमों—श्रुति (मौखिक), स्मृति (लिखित) तथा गुरु-शिष्य के प्रत्यक्ष संवाद—से संपन्न हुआ। इसे दो प्रमुख विद्याओं में वर्गीकृत किया गया: 'परा विद्या' (आध्यात्मिक व आत्म-ज्ञान) तथा 'अपरा विद्या' (व्यावहारिक, वैज्ञानिक, तकनीकी व भौतिक ज्ञान)।
भौगोलिक दृष्टि से प्राचीन ग्रंथों में वर्णित "भारतवर्ष" या "जम्बूद्वीप" में वर्तमान भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका व अफगानिस्तान के कुछ भाग) शामिल थे, जहाँ एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर सभ्यता का क्रमिक विकास हुआ। इसका प्रथम ज्ञात चरण सिंधु घाटी सभ्यता (3300–1300 ईसा पूर्व) था, जो अपनी नियोजित नगर-योजना, मानकीकृत माप-तौल तथा वैज्ञानिक जल-निकासी व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध है। इसके बाद वैदिक काल (1500–600 ईसा पूर्व) में वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) की रचना हुई, और उत्तर वैदिक काल में उपनिषदों के अभ्युदय के साथ "अहं ब्रह्मास्मि" व "तत्त्वमसि" जैसे दार्शनिक सिद्धांतों का प्रतिपादन हुआ। लगभग 800–500 ईसा पूर्व के काल में षड्दर्शन की नींव पड़ी, जबकि छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास बौद्ध व जैन धर्मों ने कर्मकांड के विरुद्ध नैतिकता-प्रधान जीवन-पद्धति का प्रचार किया और तक्षशिला, नालंदा व विक्रमशिला जैसे वैश्विक शिक्षा केंद्रों का उदय हुआ। मौर्य काल में चाणक्य के 'अर्थशास्त्र' ने सुशासन का ढांचा रखा, जबकि गुप्त काल (320–550 ईस्वी) "स्वर्ण युग" कहलाया, जिसमें गणित, खगोल, चिकित्सा व साहित्य में अभूतपूर्व उन्नति हुई। उत्तर-गुप्त एवं मध्यकाल (550–1200 ईस्वी) में चालुक्य, पल्लव, चोल व राष्ट्रकूट जैसे राजवंशों के अधीन मंदिर-स्थापत्य और दक्षिण भारतीय संगम साहित्य का विकास हुआ।
2. स्रोत, दार्शनिक चिंतन, राज्यव्यवस्था एवं
औपनिवेशिक प्रभाव
भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रमुख स्रोतों को दो
श्रेणियों—श्रुति
(चार वेद) तथा स्मृति (लिपिबद्ध ग्रंथ)—में विभाजित किया जाता है। इनमें 108 प्रमुख उपनिषद, 6 वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष), स्मृतियाँ (मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति), रामायण, महाभारत (श्रीमद्भगवद्गीता सहित), 18 पुराण, बौद्ध त्रिपिटक तथा जैन आगम ग्रंथ शामिल हैं।
दार्शनिक चिंतन के अंतर्गत आस्तिक षड्दर्शन प्रणालियाँ विकसित हुईं: सांख्य
(महर्षि कपिल - प्रकृति-पुरुष द्वैतवाद), योग (महर्षि पतंजलि - अष्टांग योग व
चित्त-वृत्ति निरोध),
न्याय
(महर्षि गौतम - तर्कशास्त्र व प्रमाण), वैशेषिक (महर्षि कणाद - परमाणुवाद), मीमांसा (महर्षि जैमिनि -
कर्मकांड व यज्ञ विधान) तथा वेदांत (महर्षि वादरायण - अद्वैत ब्रह्म)। अनास्तिक
परंपरा में बौद्ध दर्शन (चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग व क्षणिकवाद) और जैन दर्शन
(अहिंसा,
अस्तेय, स्याद्वाद व अनेकांतवाद)
प्रमुख हैं।
राज्यव्यवस्था और अर्थशास्त्र में कौटिल्य का 'सप्तांग सिद्धांत' (स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दंड, मित्र), 'मंडल सिद्धांत' और न्यायसंगत कराधान व्यवस्था ($1/6$ भाग); शुक्र रचित 'शुक्रनीति' में लोक कल्याणकारी राज्य, कर्मचारियों हेतु वेतन-पेंशन नीति व राजकीय व्यय प्रबंधन; तथा महाभारत के शांतिपर्व एवं 'विदुर नीति' में प्रजापालन व नैतिक राजधर्म का वर्णन मिलता है। ऐतिहासिक रूप से तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला व वल्लभी जैसे विश्वविद्यालय 'विश्व गुरु' के रूप में वैश्विक शिक्षा केंद्र थे, जहाँ गुरुकुलों में राजा और निर्धन दोनों के बालकों को समान शिक्षा मिलती थी। किंतु 1835 की लॉर्ड मैकाले नीति ने पारंपरिक संस्कृत शिक्षा का अनुदान बंद कर अंग्रेजी माध्यम अनिवार्य किया, ताकि भारतवासियों को उनकी बौद्धिक जड़ों से काटा जा सके। 1964-66 के कोठारी आयोग ने भी स्वीकार किया था कि स्वतंत्रता के बाद भी भारतीय शिक्षा का गुरुत्व केंद्र यूरोप-केंद्रित ही बना हुआ था, जिसे भारत-केंद्रित बनाना आवश्यक है।
3. विज्ञान, कला, वैश्विक योगदान, समसामयिक प्रासंगिकता एवं
भावी दिशा
विज्ञान, गणित, खगोलशास्त्र और चिकित्सा के क्षेत्र में भारत
का योगदान वैश्विक अनुसंधान की नींव रहा है। भारतीय गणितीय उपलब्धियों पर अल्बर्ट
आइंस्टीन ने कहा था कि "हम भारतीयों के अत्यंत आभारी हैं, जिन्होंने
हमें गिनती (अंकन प्रणाली) सिखाई, जिसके बिना दुनिया के
वैज्ञानिक आविष्कार असंभव रह जाते।" इसके अतिरिक्त महर्षि
पतंजलि का योग-सूत्र सिद्धांत—"क्रम बदलने से परिणाम बदल
जाता है"—आधुनिक
परमाणु भौतिकी (Atomic
Physics) में
परमाणुओं के पुनर्गठन (Rearrangement
of Atoms) का
आधार है। गणित व खगोल में आर्यभट (आर्यभटीय - शून्य, दशमलव प्रणाली, पाई का सटीक मान, पृथ्वी का अक्षीय घूर्णन), ब्रह्मगुप्त (ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त - शून्य के संचालन नियम व गुरुत्वाकर्षण का
प्रारंभिक विचार) और वराहमिहिर (बृहत्संहिता, पंचसिद्धान्तिका - खगोलीय पिंडों की गति व
मौसम पूर्वानुमान);
चिकित्सा
में चरक (चरक संहिता - वात, पित्त, कफ का त्रिदोष सिद्धांत), सुश्रुत (सुश्रुत संहिता - शल्य चिकित्सा व प्लास्टिक सर्जरी के जनक)
एवं नागार्जुन (रसरत्नाकर - धातु विज्ञान व पारद
प्रयोग);
भाषाशास्त्र
में पाणिनी की अष्टाध्यायी; तथा कला में भरत मुनि का नाट्यशास्त्र और 'भारतीय सौंदर्यशास्त्र' (Indian Aesthetics) ऐसे
मौलिक योगदान हैं जो आज हार्वर्ड, येल और ऑक्सफोर्ड जैसे संस्थानों में शोध के
विषय हैं।
प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा : सारणी
|
क्र. |
कालखंड/विषय |
प्रमुख विशेषताएँ |
प्रमुख उपलब्धियाँ/स्रोत |
|
1 |
सिंधु घाटी सभ्यता |
नियोजित नगर, जल निकासी, माप-तौल, व्यापार |
हड़प्पा, मोहनजोदड़ो |
|
2 |
वैदिक काल |
श्रुति परंपरा, यज्ञ, प्रकृति-चिंतन |
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद |
|
3 |
उत्तर वैदिक काल |
दार्शनिक चिंतन, आत्मा-ब्रह्म की अवधारणा |
उपनिषद |
|
4 |
षड्दर्शन काल |
तर्क, ज्ञान, आत्मा, प्रकृति एवं मोक्ष पर चिंतन |
सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदांत |
|
5 |
बौद्ध-जैन काल |
अहिंसा, नैतिकता, तर्क एवं सरल जीवन |
त्रिपिटक, जैन आगम |
|
6 |
मौर्य काल |
शासन, प्रशासन, राजनीति एवं अर्थव्यवस्था |
चाणक्य का अर्थशास्त्र |
|
7 |
गुप्त काल |
विज्ञान, गणित, खगोल, साहित्य एवं कला का विकास |
आर्यभट्ट, वराहमिहिर, कालिदास |
|
8 |
उत्तर-गुप्त काल |
क्षेत्रीय राज्यों, कला एवं साहित्य का विकास |
चोल, चालुक्य, पल्लव, राष्ट्रकूट आदि |
|
9 |
शिक्षा परंपरा |
गुरु-शिष्य परंपरा एवं उच्च शिक्षा |
तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला |
|
10 |
गणित |
संख्या पद्धति एवं गणितीय चिंतन |
शून्य, दशमलव, आर्यभटीय |
|
11 |
आयुर्वेद |
स्वास्थ्य, चिकित्सा एवं जीवन-पद्धति |
चरक संहिता, सुश्रुत संहिता |
|
12 |
व्याकरण |
भाषा का वैज्ञानिक विश्लेषण |
पाणिनि की अष्टाध्यायी |
|
13 |
कला एवं नाट्य |
नृत्य, संगीत, अभिनय एवं रंगमंच |
भरतमुनि का नाट्यशास्त्र |
|
14 |
साहित्य |
नैतिकता, दर्शन एवं जीवन-मूल्यों की अभिव्यक्ति |
रामायण, महाभारत, गीता, पुराण, संगम साहित्य |
|
15 |
अर्थशास्त्रीय चिंतन |
राज्य, कर, व्यापार, कृषि एवं आर्थिक प्रशासन |
चाणक्य का अर्थशास्त्र |
|
16 |
मुख्य मूल्य |
लोककल्याण, नैतिकता, समन्वय एवं कर्तव्य |
“सर्वे भवन्तु सुखिनः” |
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17 |
आधुनिक प्रासंगिकता |
परंपरागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय |
NEP 2020 एवं भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) |
एक नज़र में प्रमुख विद्वान एवं योगदान
|
विद्वान |
प्रमुख क्षेत्र |
प्रमुख योगदान/ग्रंथ |
|
चाणक्य (कौटिल्य) |
अर्थशास्त्र एवं राजनीति |
अर्थशास्त्र |
|
पाणिनि |
व्याकरण |
अष्टाध्यायी |
|
आर्यभट्ट |
गणित एवं खगोलशास्त्र |
आर्यभटीय |
|
वराहमिहिर |
खगोलशास्त्र |
बृहत्संहिता आदि |
|
चरक |
आयुर्वेद |
चरक संहिता |
|
सुश्रुत |
चिकित्सा एवं शल्य विज्ञान |
सुश्रुत संहिता |
|
भरतमुनि |
नाट्य एवं कला |
नाट्यशास्त्र |
|
कालिदास |
संस्कृत साहित्य |
अभिज्ञानशाकुंतलम् आदि |
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