लिखने का बदलता सफ़र- अमित भूषण
समय के साथ-साथ लिखने के तरीके में कितना परिवर्तन आया। बचपन में स्लेट को कपड़े से घोंट-घोंटकर ऐसा चमकाते थे, जैसे कोई नया आईना हो। फिर चाक को पीसकर पानी में घोलते और पटरी पर धागे की मदद से सीधी-सीधी लाइनें खींचते। इसके बाद नरकंडे (नरकुल) की नुकीली कलम जब स्लेट पर चलती, तो लगता था कि हम सिर्फ लिख नहीं रहे, बल्कि एक-एक अक्षर को गढ़ रहे हैं। धीरे-धीरे जमाना बदला। चाक और पेंसिल के बाद होल्डर-दवात वाली स्याही आई, फिर नीली-काली रंगों वाली वाली फाउंटेन पेन हाथ में आ गई। तब कॉपियों के साथ-साथ उँगलियों पर लगी स्याही भी हमारी पढ़ाई का निशान हुआ करती थी। फिर आई बॉल पेन और जेल पेन की तेजी—'लिखो और फेंको' का युग। हाथों को आराम तो मिला, पर कागज़ पर ठहरकर लिखने का वह सुकून कहीं पीछे छूटने लगा। और फिर तो सब कुछ बहुत तेजी से बदल गया। कागज़-कलम की जगह कंप्यूटर के MS Word ने ले ली। देखते ही देखते हाथ में स्मार्टफोन आ गया, उँगलियाँ चलाने की जगह बोलकर 'वॉयस टाइपिंग' होने लगी और अब तो AI का जमाना है, जहाँ सोचते ही शब्द सामने आ जाते हैं। नरकंडे की उस कलम से लेकर आज AI तक का यह सफर ...