समृद्धि से संतुलन तक—भारतीय ज्ञान परंपरा में छिपा आर्थिक विकास का शाश्वत मॉडल" लेखक: प्रीति वैश्य, अर्थशास्त्र विभाग
"समृद्धि से संतुलन तक—भारतीय ज्ञान परंपरा में छिपा आर्थिक विकास का शाश्वत मॉडल" लेखक: प्रीति वैश्य, अर्थशास्त्र विभाग जब भी 'विकास के अर्थशास्त्र' (Economics of Development) पर चर्चा होती है, तो आमतौर पर शुरुआत एडम स्मिथ, डेविड रिकार्डो या रोस्टोव के विकास चरणों से होती है। मुख्यधारा के आर्थिक शिक्षण ने लंबे समय से यह स्थापित किया है कि विकास का अर्थ केवल उत्पादन में निरंतर वृद्धि, उपभोग का विस्तार और प्रति व्यक्ति आय (GDP) को बढ़ाना है। लेकिन अर्थशास्त्र के विश्लेषणात्मक अध्ययन और व्यावहारिक परिदृश्य को देखते हुए एक बात स्पष्ट रूप से उभरकर आती है: आधुनिक आर्थिक मॉडल ने वैश्विक समाज को 'समृद्धि' का रास्ता तो दिखाया, लेकिन 'संतुलन' का सूत्र कहीं पीछे छूट गया। आज जब पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन, बढ़ती आर्थिक असमानता और संसाधनों के दोहन से उत्पन्न संकटों से जूझ रहा है, तब दुनिया एक टिकाऊ और समावेशी विकल्प की तलाश में है। इसी बिंदु पर भारतीय ज्ञान परंपरा...