विश्व खुशहाली रिपोर्ट 2026 का विश्लेषण
खुशी की तलाश और डिजिटल युग का छिपा हुआ संकट डॉ. अमित भूषण द्विवेदी रात के 2 बज रहे थे। 14 साल की अनन्या अपने कमरे में अकेली बैठी थी — मोबाइल की नीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। किसी अनजान व्यक्ति ने उसकी तस्वीर पर अपमानजनक टिप्पणी लिख दी थी। उस रात वह रोती रही। यह कोई कहानी नहीं है — आपने भी देखा होगा : सड़क किनारे घंटों एक ही जगह खड़ा युवा जो दुनिया से बेखबर स्क्रीन में गुम है , मेट्रो में आमने-सामने बैठे युवक-युवती जिनके सिर झुके हैं और रिश्ता नहीं बचा , घर में चिल्लाते माता-पिता और गुस्से में जवाब देता बच्चा , और सबसे दर्दनाक — वह नवजात शिशु जिसे डायपर बाँधकर , मुँह में बोतल थमाकर आँखों के सामने स्क्रीन रख दी गई है। जो बच्चा माँ की आवाज़ , स्पर्श और रोशनी से सीखता — उसे एक चमकती स्क्रीन के हवाले कर दिया गया है। उसकी घुटन का अहसास किसे है ? आभासी रिश्तों की भीड़ में घर के रिश्तों का मोल घट रहा है। इसी पीड़ा को विश्व खुशहाली रिपोर्ट 2026 ने पहली बार आधिकारिक आँकड़ों की भाषा में कहा है। किसी देश की असली तरक्की उसकी ऊँची इमारतों से नहीं , वहाँ के नागरिकों की मन की शांति से माप...