राजा भरथरी के योगी बनने की कहानी- अमित भूषण
भरथरी उज्जैन के महान राजा थे जो अपनी वीरता, न्याय और प्रजा-पालन के लिए प्रसिद्ध थे। वे राजा विक्रमादित्य के बड़े भाई माने जाते हैं और पहली शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास उज्जैनी (अवंती) के सिंहासन पर विराजमान थे। राजा भरथरी अत्यंत शक्तिशाली, विद्वान और धर्मपरायण शासक थे। उनका साम्राज्य विस्तृत था और उनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई थी। राजा भरथरी की रानी का नाम पिंगला था जिससे वे अत्यधिक प्रेम करते थे। उनका जीवन सुख-समृद्धि से परिपूर्ण था और वे एक आदर्श गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रहे थे।
एक दिन एक महान साधु राजा भरथरी के दरबार में आए और उन्होंने राजा को एक दिव्य फल प्रदान किया। साधु ने बताया कि यह अमरता का फल है और जो भी इसे खाएगा वह अमर हो जाएगा। राजा भरथरी ने यह अनमोल फल प्राप्त किया लेकिन उन्होंने सोचा कि मैं अकेले अमर होकर क्या करूंगा जब मेरी प्रिय रानी पिंगला नहीं होगी। उनका अपनी रानी से इतना गहरा प्रेम था कि उन्होंने वह फल अपनी रानी को दे दिया ताकि वह सदा उनके साथ रहे। लेकिन रानी पिंगला का हृदय में किसी अन्य के प्रति प्रेम था। रानी ने वह फल अपने प्रेमी को दे दिया। उस व्यक्ति ने सोचा कि अमर होने से क्या लाभ जब मेरी प्रेमिका नगर की सबसे सुंदर नर्तकी से प्रेम करती है, और उसने वह फल उस नर्तकी को दे दिया। नर्तकी ने सोचा कि राजा ही सबसे योग्य हैं इस फल के और उसने वह फल राजा भरथरी को भेंट कर दिया।
जब राजा भरथरी ने वही फल पुनः देखा जो उन्होंने अपनी रानी को दिया था, तो उनका हृदय टूट गया। उन्होंने पूरी सच्चाई जानने का प्रयास किया और जब उन्हें पता चला कि रानी पिंगला ने उनके साथ विश्वासघात किया है, तो उनका संसार के प्रति मोह-भंग हो गया। उन्होंने अनुभव किया कि यदि जिससे मैं सबसे अधिक प्रेम करता था वह भी मुझसे विश्वासघात कर सकती है, तो इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। राजा को सांसारिक सुख, राज-पाट, धन-दौलत सब व्यर्थ लगने लगे। उन्होंने गहरा वैराग्य अनुभव किया और निर्णय लिया कि अब उन्हें सत्य और शाश्वत सुख की खोज करनी होगी।
राजा भरथरी ने अपना राज-पाट अपने छोटे भाई विक्रमादित्य को सौंप दिया और संन्यास ग्रहण कर लिया। वे महान योगी गुरु गोरखनाथ की खोज में निकल पड़े। कठिन साधना और भटकने के बाद उन्हें गुरु गोरखनाथ के दर्शन हुए। गुरु गोरखनाथ ने उन्हें अपना शिष्य बनाया और नाथ पंथ में दीक्षित किया। राजा भरथरी ने कठोर तपस्या की और योग साधना में लीन हो गए। उन्होंने अपने जीवन को पूर्णतः आध्यात्मिकता को समर्पित कर दिया। नाथ पंथ की परंपरा में भरथरी को नौ नाथों में से एक महान नाथ के रूप में मान्यता प्राप्त है। उन्होंने अनेक शिष्यों को योग और आध्यात्म का मार्ग दिखाया।
राजा भरथरी केवल एक योगी ही नहीं थे बल्कि संस्कृत के महान कवि भी थे। उन्होंने तीन प्रसिद्ध शतक की रचना की जो आज भी साहित्य जगत में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। श्रृंगार शतक में उन्होंने प्रेम, सौंदर्य और मानवीय भावनाओं का अद्भुत वर्णन किया है। नीति शतक में जीवन जीने की कला, नैतिकता और व्यावहारिक ज्ञान का वर्णन है। वैराग्य शतक में उन्होंने संसार की नश्वरता, त्याग और मोक्ष के मार्ग पर प्रकाश डाला है। इन रचनाओं में उनके जीवन के दोनों पहलू दिखाई देते हैं - एक गृहस्थ राजा का जीवन और फिर एक विरक्त योगी का जीवन।
बघेलखंड, बुंदेलखंड और भोजपुरी क्षेत्रों में राजा भरथरी की कथा लोक संगीत की एक अत्यंत लोकप्रिय विधा है। यह गायन परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय है। भरथरी गायन आमतौर पर रात्रि में आयोजित होता है और पूरी रात चलता है। यह केवल मनोरंजन का साधन नहीं है बल्कि एक आध्यात्मिक और सामाजिक अनुष्ठान है जो समुदाय को एक साथ लाता है। गांव के लोग एकत्रित होते हैं और रात भर इस कथा को सुनते हैं।
भरथरी लोक गायन में मुख्य गायक को भरथरी गायक या भरथरिया कहा जाता है। ये गायक पीढ़ियों से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं और अपने पूर्वजों से यह कला सीखते हैं। गायक न केवल गाते हैं बल्कि कथा को नाटकीय रूप से प्रस्तुत भी करते हैं। वे राजा भरथरी, रानी पिंगला, गुरु गोरखनाथ और अन्य पात्रों के संवाद बोलते हैं और उनके भावों को व्यक्त करते हैं। गायक की आवाज में दर्द, प्रेम, विश्वासघात और वैराग्य के सभी रंग झलकते हैं। कई बार एक से अधिक गायक होते हैं जो संवाद शैली में कथा को प्रस्तुत करते हैं।
इस गायन में ढोलक मुख्य वाद्य यंत्र है जो पूरे प्रदर्शन में लय और ताल प्रदान करता है। ढोलक वादक अत्यंत कुशल होता है और गायन के भावों के अनुसार ताल बदलता रहता है। झांझ और करताल भी महत्वपूर्ण वाद्य यंत्र हैं जो लयकारी में सहायता करते हैं। कुछ गायक हारमोनियम का भी प्रयोग करते हैं जो गायन में मधुरता लाता है। इन वाद्य यंत्रों के संगम से एक अद्भुत संगीत रचना बनती है जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती है।
भरथरी गायन की शैली बेहद लोक-रंजक और भावपूर्ण होती है। गायक धीमी और मधुर धुनों से शुरुआत करते हैं जब राजा भरथरी के वैभव और प्रेम का वर्णन होता है। जब विश्वासघात की घटना आती है तो संगीत में दर्द और पीड़ा के स्वर उभरते हैं। वैराग्य और संन्यास के प्रसंगों में गायन गंभीर और आध्यात्मिक हो जाता है। गुरु गोरखनाथ से मिलन के प्रसंगों में भक्ति रस प्रवाहित होता है। इस प्रकार पूरे गायन में विभिन्न रसों का समावेश होता है जो श्रोताओं को भावविभोर कर देता है।
गायन की भाषा बघेली, भोजपुरी या अवधी होती है जो स्थानीय लोगों की अपनी भाषा है। इसलिए यह कथा लोगों के दिलों को छूती है क्योंकि यह उनकी अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ी है। गायक सरल और लोक भाषा में कथा कहते हैं लेकिन उसमें गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक संदेश छिपा होता है। दोहे, चौपाई और लोकगीतों के माध्यम से कथा को बुना जाता है। गायक कई बार श्रोताओं से सवाल भी पूछते हैं और उन्हें कथा में शामिल करते हैं जिससे एक संवादात्मक वातावरण बनता है।
भरथरी गायन का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत अधिक है। यह केवल मनोरंजन नहीं है बल्कि समाज को नैतिक शिक्षा देने का माध्यम है। इस कथा के माध्यम से लोगों को यह संदेश मिलता है कि संसार की सभी वस्तुएं नश्वर हैं और सच्चा सुख आध्यात्मिकता में है। यह सिखाती है कि भौतिक सुख और सत्ता क्षणभंगुर हैं और सच्चा ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति ही जीवन का उद्देश्य है। विश्वासघात के दर्द को सहकर भी कैसे व्यक्ति उच्च आध्यात्मिक मार्ग पर चल सकता है, यह इस कथा का मुख्य संदेश है।
यह गायन परंपरा विवाह, मेलों, धार्मिक अवसरों और विशेष सामाजिक समारोहों में आयोजित की जाती है। गांव के चौपाल या किसी खुले स्थान पर मंच बनाया जाता है और रात भर का कार्यक्रम होता है। महिलाएं, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग सभी इस कार्यक्रम में भाग लेते हैं। यह एक सामूहिक अनुभव होता है जो समुदाय को जोड़ता है। लोग भोजन साझा करते हैं, बातचीत करते हैं और रात भर कथा का आनंद लेते हैं। यह परंपरा पीढ़ियों को जोड़ती है क्योंकि बुजुर्ग अपने बच्चों और पोते-पोतियों के साथ बैठकर यह कथा सुनते हैं और उन्हें अपनी संस्कृति से परिचित कराते हैं।
आधुनिक समय में भी भरथरी गायन की परंपरा जीवित है हालांकि इसे चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। शहरीकरण और आधुनिक मनोरंजन के साधनों जैसे टेलीविजन, सिनेमा और इंटरनेट के कारण युवा पीढ़ी इस परंपरा से दूर होती जा रही है। फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में यह परंपरा अभी भी मजबूती से बनी हुई है। कई सांस्कृतिक संस्थाएं और सरकारी संगठन इस परंपरा को संरक्षित करने के प्रयास कर रहे हैं। भरथरी गायकों को मंच और प्रोत्साहन दिया जा रहा है ताकि यह अनमोल सांस्कृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सके।
भरथरी की कथा और उसका लोक गायन भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि कैसे एक ऐतिहासिक-पौराणिक कथा सदियों से लोक मानस में जीवित रहती है और लोक कला के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी संचरित होती रहती है। राजा भरथरी का जीवन मानव जीवन की जटिलताओं, प्रेम, विश्वासघात, वैराग्य और आध्यात्मिक उत्थान की एक संपूर्ण यात्रा है। उनकी कथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी क्योंकि मानवीय भावनाएं और जीवन के मूल प्रश्न आज भी वही हैं।
बघेली क्षेत्र में भरथरी गायन की परंपरा विशेष रूप से समृद्ध रही है। रीवा, सतना, सीधी, शहडोल और उमरिया जिलों में यह लोक विधा अत्यंत लोकप्रिय है। बघेली भाषा में गाए जाने वाले भरथरी के गीत अपनी विशिष्ट धुन और भावप्रवणता के लिए जाने जाते हैं। इन गीतों में राजा भरथरी के जीवन के विभिन्न प्रसंगों को बड़ी ही सुंदरता से प्रस्तुत किया जाता है। सबसे लोकप्रिय गीतों में से एक है जिसमें राजा भरथरी अपनी रानी पिंगला से कहते हैं, "पिंगला रानी तोरे कारन राज पाट छोड़ देहौं, अमर फल तोका दे देहौं सदा संग रहें के खातिर।" यह गीत राजा के गहन प्रेम को दर्शाता है। एक अन्य मार्मिक गीत में जब राजा को विश्वासघात का पता चलता है तो वे गाते हैं, "का करौं राज पाट का करौं धन दौलत, जब अपनी रानी करि गवा बेइमानी।" इस गीत में राजा की पीड़ा और मोह-भंग की अवस्था का जीवंत चित्रण है।
वैराग्य के प्रसंग में गाया जाने वाला एक प्रसिद्ध गीत है जिसमें भरथरी कहते हैं, "सब माया है जगत की, सब झूठा है संसार, गुरु गोरख के चरन में शरन लेहौं अब हम यार।" यह गीत उनके आध्यात्मिक परिवर्तन को दर्शाता है। गुरु गोरखनाथ से मिलन का प्रसंग भी बड़ा भावपूर्ण होता है जिसमें गाया जाता है, "गुरु गोरख बाबा तोरे दरस पाय के, भवसागर से तर गवौं राजा भरथरी।" इन गीतों में बघेली भाषा की मिठास और लोक धुनों का अद्भुत संगम होता है जो श्रोताओं को भावविभोर कर देता है।
बघेलखंड में कई प्रतिष्ठित भरथरी गायक हुए हैं जिन्होंने इस परंपरा को जीवित रखा है। पंडित राम सहाय पांडेय बघेलखंड के सबसे प्रसिद्ध भरथरी गायकों में से एक माने जाते हैं जिन्होंने अपने जीवनकाल में हजारों कार्यक्रम किए और इस विधा को नई ऊंचाइयां दीं। उनकी आवाज में जादू था और वे कथा को इतनी सजीवता से प्रस्तुत करते थे कि श्रोता भावविभोर हो जाते थे। लालू मानिकपुरी भी बघेलखंड के एक महान भरथरी गायक थे जिन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में इस परंपरा को लोकप्रिय बनाया। रामकृपाल यादव ने भी भरथरी गायन में महत्वपूर्ण योगदान दिया और युवा पीढ़ी को इस कला से जोड़ने का प्रयास किया।
वर्तमान समय में भी कुछ समर्पित कलाकार इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। सुरेश चौधरी रीवा जिले के एक प्रसिद्ध भरथरी गायक हैं जो पिछले तीन दशकों से इस विधा को समर्पित हैं। उन्होंने पारंपरिक गायन शैली को बनाए रखते हुए कुछ नए प्रयोग भी किए हैं। राजेश पांडेय सतना के एक युवा भरथरी गायक हैं जो इस परंपरा को युवाओं तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कई रिकॉर्डिंग की हैं और सोशल मीडिया के माध्यम से भी इस कला को प्रचारित कर रहे हैं। गिरिजा शंकर तिवारी शहडोल के एक अनुभवी गायक हैं जो अपने पिता से यह कला सीखी और अब अपने बेटे को भी सिखा रहे हैं जिससे यह परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहे।
बघेलखंड की महिला गायिकाओं ने भी इस क्षेत्र में योगदान दिया है। सरस्वती देवी ने भरथरी गायन में रानी पिंगला के पात्र को जीवंत किया और महिला कलाकारों के लिए मार्ग प्रशस्त किया। शांति बाई ने भी इस परंपरा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ये कलाकार न केवल गायन करते हैं बल्कि इस कला को सीखने के इच्छुक युवाओं को प्रशिक्षण भी देते हैं। कई गांवों में भरथरी मंडलियां हैं जो नियमित रूप से अभ्यास करती हैं और सामाजिक अवसरों पर प्रस्तुति देती हैं।
मध्य प्रदेश सरकार और संगीत नाटक अकादमी ने भी इन कलाकारों को सम्मानित किया है और उन्हें मंच प्रदान किया है। कई सांस्कृतिक उत्सवों में भरथरी गायन को स्थान मिलता है जिससे यह विधा व्यापक दर्शकों तक पहुंचती है। इन कलाकारों की समर्पण और लगन से ही बघेलखंड की यह अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर आज भी जीवित है। भरथरी लोक गायन इस कालजयी कथा को जीवंत रखने का एक सशक्त माध्यम है जो न केवल मनोरंजन प्रदान करता है बल्कि जीवन की गहरी सीख भी देता है और बघेली संस्कृति की पहचान को बनाए रखता है।
डॉ. अमित भूषण द्विवेदी, प्रधानमन्त्री उत्कृष्ट महाविद्यालय, शासकीय तुलसी महाविद्यालय में अर्थशास्त्र विषय के सहायक प्राध्यापक हैं.
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