Short e Resources for Honours Economics IV Year DS E01: Agricultural Economics- Amit Bhushan

 

 

प्राइम मिनिस्टर कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, अनूपपुर

अर्थशास्त्र विभाग

 

 

इकाई - I

परिचय (Introduction)

कृषि अर्थशास्त्र

Agriculture Economics — DSE-I

 

 

पाठ्यक्रम कोड

A4-ECON1D  |  DSE – I

कक्षा / वर्ष

B.A. चतुर्थ वर्ष  |  सत्र 2024-25

इकाई

I — परिचय  |  व्याख्यान: 12 घंटे

विषय-वस्तु

5 उप-विषय

अधिकतम अंक

CCE: 30 + विश्वविद्यालय परीक्षा: 70 = 100

 

इस इकाई में सम्मिलित विषय:

1. कृषि अर्थशास्त्रपरिभाषा, प्रकृति, क्षेत्र एवं महत्व

2. कृषि के अंतरक्षेत्रीय संबंध (Inter-Sectoral Linkages)

3. मेलर का कृषि विकास का सिद्धांत

4. कृषि विकास का फाई-रैनिस प्रतिरूप

5. शुल्ज़ और बोसरप का कृषि विकास का सिद्धांत

 

 

  विषय 1: कृषि अर्थशास्त्रपरिभाषा, प्रकृति, क्षेत्र एवं महत्व

 

  1.1 भूमिका (Introduction)

कृषि मानव सभ्यता का आधार रही है। भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ आज भी 60-65% जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। राष्ट्रीय आय, रोजगार, निर्यात और खाद्य सुरक्षासभी में कृषि की केंद्रीय भूमिका है। इसीलिए कृषि अर्थशास्त्र का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यावहारिक है।

कृषि अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र की वह विशेष शाखा है जो कृषि-संबंधित आर्थिक समस्याओं का वैज्ञानिक विश्लेषण करती है। यह बताती है कि किसान अपने सीमित संसाधनों (भूमि, श्रम, पूँजी, जल) का उपयोग किस प्रकार करें जिससे अधिकतम उत्पादन, अधिकतम आय और जीवन-स्तर में सुधार हो सके।

 

  1.2 कृषि अर्थशास्त्र की परिभाषाएं (Definitions)

विभिन्न विद्वानों ने कृषि अर्थशास्त्र को निम्न प्रकार परिभाषित किया है:

 

विद्वान

परिभाषा

Heady (1952)

कृषि अर्थशास्त्र वह विज्ञान है जो कृषि उद्यम के संचालन और प्रबंधन में आर्थिक सिद्धांतों का प्रयोग करता है।

Bishwanath (1969)

कृषि अर्थशास्त्र, अर्थशास्त्र की वह शाखा है जो कृषि उद्योग से संबंधित आर्थिक समस्याओं और उनके समाधान का अध्ययन करती है।

Gray (1924)

कृषि अर्थशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है जो कृषि के विभिन्न आर्थिक पहलुओं की व्याख्या तथा समझने में सहायता करता है।

T.W. Schultz

कृषि अर्थशास्त्र वह अनुशासन है जो कृषि संसाधनों के आवंटन, उत्पादन निर्णयों और कृषि बाज़ार के व्यवहार का अध्ययन करता है।

Joshi & Bhatt

कृषि अर्थशास्त्र आर्थिक विश्लेषण की वह शाखा है जो कृषि क्षेत्र में संसाधनों के कुशल उपयोग से संबंधित है।

 

सरल परिभाषा (परीक्षा के लिए):

कृषि अर्थशास्त्र = अर्थशास्त्र के सिद्धांत + कृषि की समस्याएं  यह विज्ञान बताता है कि किसान सीमित संसाधनों से अधिकतम उत्पादन और आय कैसे प्राप्त करे।

 

  1.3 कृषि अर्थशास्त्र की प्रकृति (Nature)

कृषि अर्थशास्त्र की प्रकृति के बारे में दो दृष्टिकोण हैं:

 

  () विज्ञान के रूप में (As a Science)

कृषि अर्थशास्त्र एक विज्ञान है क्योंकि:

    इसमें कार्य-कारण संबंध स्थापित किए जाते हैंजैसे खाद डालने से उत्पादन बढ़ता है

    इसके नियम और सिद्धांत सार्वभौमिक रूप से लागू होते हैं

    इसमें वैज्ञानिक पद्धति (परीक्षण, अनुसंधान, विश्लेषण) का प्रयोग होता है

    यह सकारात्मक विज्ञान (Positive Science) हैयह बताता है 'क्या है'

    यह आदर्शात्मक विज्ञान (Normative Science) भी हैयह बताता है 'क्या होना चाहिए'

 

  () कला के रूप में (As an Art)

कृषि अर्थशास्त्र एक कला भी है क्योंकि:

    इसके सिद्धांतों को व्यावहारिक जीवन में लागू करने के लिए कौशल और अनुभव चाहिए

    किसान की परिस्थिति के अनुसार नीतियां बनाना एक कला है

    संसाधनों का कुशल आवंटन व्यावहारिक निर्णय-क्षमता मांगता है

 

  () सकारात्मक एवं आदर्शात्मक अर्थशास्त्र

 

आधार

सकारात्मक (Positive)

आदर्शात्मक (Normative)

अर्थ

वास्तविक स्थिति का वर्णन

आदर्श स्थिति का निर्धारण

प्रश्न

'क्या है?'

'क्या होना चाहिए?'

उदाहरण

भारत में किसान की औसत आय ₹8000/माह है

किसान की आय ₹20000/माह होनी चाहिए

उद्देश्य

तथ्यों का विश्लेषण

नीति-निर्माण में सहायता

 

  1.4 कृषि अर्थशास्त्र का क्षेत्र (Scope)

कृषि अर्थशास्त्र का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसे निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है:

 

  1. कृषि उत्पादन अर्थशास्त्र (Farm Production Economics)

यह उत्पादन से संबंधित निर्णयों का अध्ययन करता है:

    क्या उत्पादन करेंफसल चुनाव

    कितना उत्पादन करेंउत्पादन स्तर

    किन साधनों का प्रयोग करेंभूमि, श्रम, पूँजी का मिश्रण

    उत्पादन लागत का न्यूनीकरण कैसे करें

 

  2. कृषि वित्त (Agricultural Finance)

    किसान को ऋण की आवश्यकतासंस्थागत एवं गैर-संस्थागत स्रोत

    बैंक, सहकारी समितियां, NABARD की भूमिका

    फसल ऋण, दीर्घकालीन ऋण

    किसान कर्ज और ऋण-मुक्ति

 

  3. कृषि विपणन (Agricultural Marketing)

    कृषि उत्पादों की बिक्री, मंडी व्यवस्था

    मूल्य निर्धारण — MSP, बाज़ार मूल्य

    बिचौलियों की समस्या और समाधान

    -नाम (e-NAM), APMC सुधार

 

  4. कृषि नीति (Agricultural Policy)

    सरकारी योजनाएं — PM-KISAN, फसल बीमा

    सब्सिडी नीतिखाद, बीज, सिंचाई

    न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) नीति

    WTO और कृषि व्यापार नीति

 

  5. भूमि अर्थशास्त्र (Land Economics)

    भूमि सुधारजमींदारी उन्मूलन, चकबंदी

    काश्तकारी व्यवस्थाबटाईदारी, किरायेदारी

    भूमि उपयोग और संरक्षण

 

  6. ग्रामीण विकास (Rural Development)

    ग्रामीण रोजगार — MNREGA

    गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम

    सहकारी आंदोलन

    ग्रामीण बुनियादी ढांचा

 

  7. तुलनात्मक और अंतर्राष्ट्रीय कृषि अर्थशास्त्र

    विभिन्न देशों की कृषि व्यवस्था की तुलना

    कृषि उत्पादों का आयात-निर्यात

    WTO समझौते और भारतीय कृषि

 

क्षेत्र

विषय-वस्तु

महत्व

उत्पादन अर्थशास्त्र

फसल चुनाव, लागत, लाभ

अधिकतम उत्पादन हेतु

कृषि वित्त

ऋण, NABARD, सहकारी

पूँजी उपलब्धता

कृषि विपणन

मंडी, MSP, बिचौलिए

उचित मूल्य हेतु

कृषि नीति

सब्सिडी, PM-KISAN

सरकारी सहायता

भूमि अर्थशास्त्र

भूमि सुधार, काश्त

भूमि न्याय

ग्रामीण विकास

MNREGA, गरीबी

जीवन-स्तर उन्नति

 

  1.5 कृषि अर्थशास्त्र का महत्व (Importance)

भारत जैसे विकासशील देश में कृषि अर्थशास्त्र का अध्ययन अनेक कारणों से महत्वपूर्ण है:

 

  (1) राष्ट्रीय आय में योगदान

भारत के GDP में कृषि क्षेत्र का योगदान लगभग 16-18% है। यद्यपि पिछले दशकों में यह अनुपात घटा है, फिर भी यह एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है। 1950-51 में यह 55% था।

 

  (2) रोजगार

कुल श्रम शक्ति का लगभग 44-50% कृषि क्षेत्र में नियोजित है। यह क्षेत्र बेरोजगारी और अर्द्ध-बेरोजगारी की समस्या को सीमित रखता है।

 

  (3) खाद्य सुरक्षा

देश की 140 करोड़ जनसंख्या की खाद्य आवश्यकता पूर्ण करना कृषि का प्राथमिक उद्देश्य है। हरित क्रांति के बाद भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बना।

 

  (4) विदेशी मुद्रा अर्जन

चाय, कॉफी, मसाले, कपास, चावल आदि कृषि उत्पादों के निर्यात से भारत को महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।

 

  (5) उद्योगों को कच्चा माल

वस्त्र उद्योग को कपास, चीनी उद्योग को गन्ना, वनस्पति घी उद्योग को तिलहन, जूट उद्योग को जूटये सभी कृषि से प्राप्त होते हैं।

 

  (6) बाजार प्रदान करना

ग्रामीण जनसंख्या औद्योगिक उत्पादों का बड़ा उपभोक्ता वर्ग है। कृषि आय बढ़ने से औद्योगिक उत्पादों की मांग बढ़ती है।

 

  (7) सरकारी राजस्व

भूमि कर, कृषि उत्पाद पर कर, सिंचाई शुल्क आदि सरकार को राजस्व प्रदान करते हैं।

 

  (8) पूँजी निर्माण

कृषि क्षेत्र की बचत और निवेश से पूँजी निर्माण होता है जो औद्योगिक विकास में सहायक होता है।

 

याद रखें (परीक्षा हेतु):

भारत में कृषि का महत्व — 8 बिंदु: 1. GDP में 16-18% योगदान 2. 44-50% रोजगार 3. खाद्य सुरक्षा 4. विदेशी मुद्रा अर्जन 5. उद्योगों को कच्चा माल 6. औद्योगिक उत्पादों का बाजार 7. सरकारी राजस्व 8. पूँजी निर्माण

 

 

  विषय 2: कृषि के अंतरक्षेत्रीय संबंध (Inter-Sectoral Linkages of Agriculture)

 

  2.1 अर्थ एवं परिभाषा

'अंतरक्षेत्रीय संबंध' से अभिप्राय हैकृषि क्षेत्र और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों (उद्योग, सेवा, व्यापार) के बीच परस्पर निर्भरता एवं आदान-प्रदान के संबंध।

जब कृषि क्षेत्र में परिवर्तन होता है तो उसका प्रभाव अन्य सभी क्षेत्रों पर पड़ता है और इसी तरह अन्य क्षेत्रों में परिवर्तन से कृषि प्रभावित होती है। यह द्विमुखी संबंध ही अंतरक्षेत्रीय संबंध कहलाता है।

 

महत्वपूर्ण परिभाषा:

"कृषि के अंतरक्षेत्रीय संबंध वे आर्थिक सम्पर्क हैं जो कृषि को उद्योग, सेवा और अन्य आर्थिक क्रियाओं से जोड़ते हैं, जिससे समग्र आर्थिक विकास संभव होता है।" — कुज़्नेट्स

 

  2.2 अंतरक्षेत्रीय संबंधों के प्रकार

 

  प्रकार 1: उत्पाद संबंध (Product Linkage)

कृषि क्षेत्र उद्योगों को कच्चा माल प्रदान करता है।

 

कृषि उत्पाद

संबंधित उद्योग

कपास

वस्त्र उद्योग (Cotton Textile Industry)

गन्ना

चीनी उद्योग (Sugar Industry)

जूट

जूट उद्योग (Jute Industry)

तिलहन

वनस्पति घी / खाद्य तेल उद्योग

रबड़

टायर उद्योग

तम्बाकू

सिगरेट उद्योग

चाय / कॉफी

प्रसंस्करण उद्योग

 

  प्रकार 2: अग्रवर्ती संबंध (Forward Linkages)

कृषि क्षेत्र आगे (उद्योग, व्यापार, उपभोक्ता) की ओर संबंध स्थापित करता है। अर्थात् कृषि उत्पाद अन्य क्षेत्रों में कच्चे माल के रूप में जाते हैं।

सूत्र: कृषिकच्चा मालउद्योगतैयार मालउपभोक्ता

    कपासधागाकपड़ावस्त्रउपभोक्ता

    गन्नारसचीनीमिठाईउपभोक्ता

    दूधप्रसंस्करणडेयरी उत्पादउपभोक्ता

 

  प्रकार 3: पश्चवर्ती संबंध (Backward Linkages)

कृषि क्षेत्र अन्य उद्योगों से आगत (inputs) प्राप्त करता है। अर्थात् अन्य क्षेत्र कृषि को संसाधन प्रदान करते हैं।

    खाद उद्योगकृषि को उर्वरक

    कृषि यंत्र उद्योगट्रैक्टर, हार्वेस्टर

    रासायनिक उद्योगकीटनाशक, फफूंदीनाशक

    पेट्रोलियम उद्योगडीजल, पेट्रोल

    सिंचाई विभागनहरें, बांध, जल

 

  प्रकार 4: माँग संबंध (Demand Linkage)

कृषि आय बढ़ने से ग्रामीण उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति बढ़ती है, जिससे औद्योगिक उत्पादों की माँग बढ़ती है।

    कृषि आय बढ़ीकिसान ने TV, मोबाइल खरीदाउद्योग को लाभ

    ग्रामीण आयशहरी उद्योगों का विस्तार

 

  प्रकार 5: श्रम संबंध (Labour Linkage)

कृषि क्षेत्र में अतिरिक्त श्रम उद्योग क्षेत्र में स्थानांतरित होता है:

    कृषि में अर्द्ध-बेरोजगार मजदूरउद्योगों में काम

    ग्रामीण-नगरीय श्रम प्रवास (Rural-Urban Migration)

 

  प्रकार 6: निवेश संबंध (Investment/Capital Linkage)

कृषि से प्राप्त बचत उद्योगों में निवेश होती है और उद्योगों की पूँजी कृषि में लगती है:

    कृषि बचतबैंकउद्योग में ऋण

    उद्योग लाभकृषि आधुनिकीकरण में निवेश

 

संबंध का प्रकार

दिशा

उदाहरण

प्रभाव

उत्पाद

कृषिउद्योग

कपासवस्त्र

औद्योगिक विकास

अग्रवर्ती

कृषिअन्य क्षेत्र

गन्नाचीनी

मूल्य संवर्धन

पश्चवर्ती

अन्य क्षेत्रकृषि

खादकृषि

उत्पादकता वृद्धि

माँग

कृषि आयखरीद

आय → TV खरीद

औद्योगिक माँग

श्रम

कृषिउद्योग

प्रवास

औद्योगिक श्रम पूर्ति

निवेश

द्विमुखी

बचत-निवेश

पूँजी निर्माण

 

  2.3 अंतरक्षेत्रीय संबंधों का महत्व

    समग्र आर्थिक विकास को गति मिलती है

    कृषि और उद्योग दोनों एक-दूसरे की वृद्धि में सहायक होते हैं

    रोजगार के अवसर बढ़ते हैं

    ग्रामीण-नगरीय विषमता कम होती है

    राष्ट्रीय आय में वृद्धि होती है

 

 

  विषय 3: मेलर का कृषि विकास का सिद्धांत (Mellor's Theory of Agriculture Development)

 

परिचय:

प्रो. जॉन डब्ल्यू. मेलर (John W. Mellor) अमेरिकी कृषि अर्थशास्त्री हैं। उन्होंने 1966 में अपनी पुस्तक 'The Economics of Agricultural Development' में यह सिद्धांत प्रस्तुत किया। यह सिद्धांत विकासशील देशों में कृषि विकास की प्रक्रिया को तीन अवस्थाओं में समझाता है।

 

  3.1 सिद्धांत की मुख्य मान्यताएं (Assumptions)

    अर्थव्यवस्था कृषि-प्रधान है

    तकनीकी परिवर्तन से कृषि विकास संभव है

    किसान तर्कसंगत आर्थिक व्यवहार करते हैं

    श्रम का कृषि से उद्योग में क्रमिक स्थानांतरण होता है

    कृषि विकास ही समग्र आर्थिक विकास का आधार है

 

  3.2 कृषि विकास की तीन अवस्थाएं (Three Stages)

 

  अवस्था 1: परंपरागत या निर्वाह कृषि (Traditional/Subsistence Agriculture)

यह कृषि विकास की प्रारंभिक अवस्था है। इसकी विशेषताएं:

    उद्देश्य: केवल अपने परिवार के लिए अन्न उत्पादन

    बाज़ार के लिए उत्पादन नहीं

    परंपरागत तकनीकहल, बैल, पारंपरिक बीज

    अतिरिक्त श्रम की उपस्थिति (Disguised Unemployment)

    उत्पादकता अत्यंत कम

    किसान जोखिम से बचता है, नई तकनीक नहीं अपनाता

    मुद्रा अर्थव्यवस्था का अभाव, वस्तु विनिमय प्रचलित

इस अवस्था में विकास की संभावना सीमित होती है। उत्पादन स्थिर रहता है।

 

  अवस्था 2: संक्रमणकालीन या मिश्रित कृषि (Transitional/Mixed Agriculture)

यह मध्यवर्ती अवस्था है जिसमें परंपरागत और आधुनिक दोनों प्रकार की कृषि साथ-साथ चलती है।

    नई तकनीक और परंपरागत विधियों का मिश्रण

    बाज़ार के लिए कुछ उत्पादन होने लगता है

    किसान की आय में कुछ वृद्धि

    कृषि ऋण की माँग बढ़ती है

    श्रम का धीरे-धीरे उद्योग की ओर स्थानांतरण

    सहकारी समितियों का उदय

इस अवस्था में आधुनिकीकरण का बीज पड़ता है।

 

  अवस्था 3: आधुनिक वाणिज्यिक कृषि (Modern Commercial Agriculture)

यह विकास की उन्नत अवस्था है। इसकी विशेषताएं:

    पूर्णतः बाज़ार-उन्मुख उत्पादन

    उन्नत बीज, रासायनिक खाद, सिंचाई, यंत्रीकरण

    कृषि उद्यम की तरह संचालितलागत-लाभ विश्लेषण

    कृषि में पूँजी निवेश

    उत्पादकता और आय उच्च

    कृषि क्षेत्र से श्रम उद्योग में जाता है

    कृषि का औद्योगीकरण

 

विशेषता

अवस्था 1 (परंपरागत)

अवस्था 2 (मिश्रित)

अवस्था 3 (आधुनिक)

उद्देश्य

परिवार हेतु

आंशिक बाज़ार

पूर्ण बाज़ार

तकनीक

परंपरागत

मिश्रित

आधुनिक

उत्पादकता

निम्न

मध्यम

उच्च

आय

न्यून

मध्यम

उच्च

पूँजी

नगण्य

कुछ

पर्याप्त

श्रम

अतिरिक्त

स्थानांतरण शुरू

कम श्रम

उदाहरण

1960 से पहले का भारत

1970-90 का भारत

विकसित देश

 

  3.3 कृषि विकास के लिए मेलर के उपाय (Measures by Mellor)

    उन्नत कृषि तकनीक को बढ़ावा — HYV बीज, रासायनिक खाद

    कृषि शिक्षा और प्रशिक्षणकिसान प्रशिक्षण केंद्र

    कृषि ऋण की उपलब्धताकिसान क्रेडिट कार्ड

    उचित मूल्य नीति — MSP का निर्धारण

    परिवहन एवं भंडारणकोल्ड स्टोरेज, मंडी

    ग्रामीण संस्थाओं का विकाससहकारी समितियां

    सिंचाई का विस्तारनहर, ट्यूबवेल, ड्रिप

 

  3.4 मेलर सिद्धांत की आलोचना (Criticism)

    केवल तकनीकी पहलू पर अधिक ध्यान, सामाजिक पहलुओं की उपेक्षा

    संस्थागत सुधारों (भूमि सुधार, जाति व्यवस्था) को कम महत्व

    तीनों अवस्थाओं के बीच स्पष्ट सीमा नहीं

    विकासशील देशों की विविध परिस्थितियों को नज़रअंदाज़

    पूँजी की उपलब्धता और वित्तीय बाज़ार की उपेक्षा

 

  3.5 मेलर सिद्धांत का महत्व (Relevance)

    भारत की हरित क्रांति (1960-70) मेलर के विचारों पर आधारित थी

    यह सिद्धांत कृषि विकास की एक व्यावहारिक रूपरेखा प्रदान करता है

    विकासशील देशों की कृषि नीतियों में यह सिद्धांत प्रासंगिक है

 

 

  विषय 4: कृषि विकास का फाई-रैनिस प्रतिरूप (Fei-Ranis Model)

 

परिचय:

जॉन फ़ाई (John C.H. Fei) और गुस्ताव रैनिस (Gustav Ranis) — दोनों अमेरिकी अर्थशास्त्री थे। उन्होंने 1961 में अपना मॉडल प्रस्तुत किया। यह W. Arthur Lewis के द्विक्षेत्रीय मॉडल (Dual Sector Model) का विस्तार है। पुस्तक: "Development of the Labour Surplus Economy" (1964)

 

  4.1 मॉडल की मान्यताएं (Assumptions)

    अर्थव्यवस्था दो क्षेत्रों में विभाजितकृषि (पारंपरिक) और उद्योग (आधुनिक)

    कृषि क्षेत्र में अतिरिक्त श्रम (Surplus Labour) विद्यमान है

    कृषि में श्रम की सीमांत उत्पादकता (MP) शून्य या नकारात्मक है

    उद्योग क्षेत्र में पूँजीवादी उत्पादन होता है

    प्रारंभिक अवस्था में केवल कृषि से जीवन-निर्वाह होता है

    तकनीकी परिवर्तन को बाह्य माना गया है

 

  4.2 मॉडल का केंद्रीय विचार

फाई-रैनिस मॉडल यह समझाता है कि कृषि प्रधान अल्पविकसित देश किस प्रकार धीरे-धीरे औद्योगिक विकास की ओर आगे बढ़ते हैं। इसमें अतिरिक्त कृषि श्रमिकों का उद्योग क्षेत्र में क्रमिक स्थानांतरण केंद्रीय प्रक्रिया है।

 

  4.3 श्रम स्थानांतरण की तीन अवस्थाएं (Three Phases)

  प्रथम अवस्था (Phase I): शून्य सीमांत उत्पादकता

इस अवस्था में:

    कृषि में अतिरिक्त श्रमिकों की भरमार है

    अतिरिक्त श्रमिक की सीमांत उत्पादकता = शून्य (MP = 0)

    इन अतिरिक्त श्रमिकों को बिना कृषि उत्पादन घटाए उद्योग में भेजा जा सकता है

    कृषि क्षेत्र में Disguised Unemployment (छुपी बेरोजगारी) होती है

    यह अवस्था अधिकांश भारतीय गाँवों में देखी जाती है

उदाहरण: एक खेत में 10 मजदूर हैं जबकि 6 से काम हो सकता है — 4 अतिरिक्त हैं।

 

  द्वितीय अवस्था (Phase II): सीमांत उत्पादकता धनात्मक लेकिन कम

    इस अवस्था में श्रमिकों की MP शून्य से ऊपर लेकिन औसत उत्पादकता (AP) से कम है

    श्रमिकों का उद्योग में स्थानांतरण अब कृषि उत्पादन को थोड़ा प्रभावित करता है

    कृषि क्षेत्र को इस नुकसान की भरपाई के लिए तकनीकी सुधार ज़रूरी

    यदि तकनीकी प्रगति हो तो दोनों क्षेत्र विकसित हो सकते हैं

 

  तृतीय अवस्था (Phase III): वाणिज्यीकरण बिंदु

    इस अवस्था में श्रम की MP = बाज़ार मज़दूरी

    कृषि और उद्योग दोनों में मज़दूरी समान हो जाती है

    इस बिंदु को 'वाणिज्यीकरण बिंदु' (Commercialization Point) कहते हैं

    अब कृषि भी बाज़ार-उन्मुख हो जाती है

    वास्तविक आर्थिक विकास यहाँ से प्रारंभ होता है

 

अवस्था

श्रम MP

स्थानांतरण प्रभाव

स्थिति

अवस्था I

शून्य (MP=0)

कृषि उत्पादन अप्रभावित

Disguised Unemployment

अवस्था II

धनात्मक, AP से कम

कृषि उत्पादन कुछ घटता है

तकनीकी सुधार ज़रूरी

अवस्था III

MP = बाज़ार मज़दूरी

दोनों क्षेत्र संतुलित

वाणिज्यीकरण बिंदु

 

  4.4 मॉडल में कृषि की भूमिका

    कृषि उद्योग को श्रम प्रदान करती है

    कृषि खाद्यान्न उत्पादन से औद्योगिक श्रमिकों का पोषण करती है

    कृषि की बचत उद्योग में पूँजी के रूप में जाती है

    कृषि आय से उद्योगों के उत्पाद की माँग बढ़ती है

 

  4.5 फाई-रैनिस मॉडल की आलोचना (Criticism)

    पूँजीपतियों द्वारा लाभ को उद्योग में ही पुनर्निवेश करने की मान्यता अवास्तविक

    कृषि में तकनीकी परिवर्तन को बाह्य मान लिया गया

    लैटिन अमेरिका और अफ्रीका की विशिष्ट परिस्थितियों को नज़रअंदाज़

    वास्तव में श्रम का स्थानांतरण इतना सरल नहीं होतासामाजिक बाधाएं भी होती हैं

    बाज़ार की अपूर्णताओं की उपेक्षा

 

  4.6 भारत के संदर्भ में प्रासंगिकता

    भारत में प्रथम अवस्था स्पष्ट रूप से दिखती हैकृषि में छुपी बेरोजगारी

    हरित क्रांति ने तकनीकी सुधार कर द्वितीय अवस्था में मदद की

    शहरीकरण और ग्रामीण-नगर प्रवास इसी मॉडल की प्रक्रिया है

 

 

  विषय 5: शुल्ज़ और बोसरप का कृषि विकास का सिद्धांत

 

  5.1 शुल्ज़ का सिद्धांत (Schultz's Theory of Agricultural Development)

परिचय:

प्रो. थॉमस डब्ल्यू. शुल्ज़ (Thomas W. Schultz) — अमेरिकी अर्थशास्त्री। नोबेल पुरस्कार विजेता (1979) पुस्तक: "Transforming Traditional Agriculture" (1964) मुख्य विचार: परंपरागत कृषि को नए आगत परिवर्तनों द्वारा आधुनिक बनाया जा सकता है।

 

  5.1.1 सिद्धांत की मुख्य मान्यताएं

    परंपरागत कृषि में किसान कुशल होता है और उपलब्ध साधनों का अनुकूलतम उपयोग करता है

    किसान 'गरीब लेकिन कुशल' (Poor but Efficient) होता हैवह फ़ालतू नहीं होता

    परंपरागत कृषि में विकास की सीमित गुंजाइश है

    विकास के लिए नए आगत परिवर्तन (New Inputs) ज़रूरी हैं

    किसान नए आगत तभी अपनाता है जब उसकी लागत-लाभ दर अनुकूल हो

 

  5.1.2 'गरीब लेकिन कुशल' का विचार (Poor but Efficient Hypothesis)

शुल्ज़ का यह सबसे महत्वपूर्ण विचार है। उनका कहना था:

    परंपरागत किसान जानता है कि उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग कैसे करें

    यदि किसान 'आलसी' या 'अकुशल' होता तो उत्पादन और भी कम होता

    किसान की कम आय उसकी अकुशलता का नहीं, सीमित संसाधनों का परिणाम है

    अतः: किसान को दोष नहींउसे बेहतर संसाधन चाहिए

 

  5.1.3 नए आगत परिवर्तन (New Inputs)

शुल्ज़ के अनुसार कृषि विकास के लिए निम्न नए आगत परिवर्तन आवश्यक हैं:

 

नया आगत

विवरण

उदाहरण

उन्नत बीज

उच्च उपज देने वाली किस्में

HYV गेहूं, धान (IR-8)

रासायनिक खाद

नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम

यूरिया, DAP, MOP

सिंचाई

कृत्रिम जल-प्रबंधन

नहर, ट्यूबवेल, ड्रिप

कृषि यंत्र

ट्रैक्टर, थ्रेशर

यंत्रीकरण

कीटनाशक

फसल सुरक्षा

Endosulfan, Neem

मानव पूँजी

शिक्षा और प्रशिक्षण

KVK, कृषि विश्वविद्यालय

संस्थागत सुधार

भूमि सुधार, बाज़ार

मंडी, सहकारी

 

  5.1.4 मानव पूँजी की अवधारणा (Human Capital)

शुल्ज़ ने मानव पूँजी के महत्व पर विशेष बल दिया:

    शिक्षित किसान नई तकनीक को जल्दी समझता और अपनाता है

    कृषि अनुसंधान और विस्तार सेवाएं आवश्यक हैं

    'मानव पूँजी' में निवेश कृषि विकास के लिए आवश्यक है

    कृषि विश्वविद्यालय, KVK (Krishi Vigyan Kendra) की स्थापना

 

  5.1.5 नए आगत को अपनाने की प्रक्रिया

किसान नया आगत तभी अपनाता है जब:

शर्त

विवरण

1. आगत की उपलब्धता

नया बीज या खाद बाज़ार में उपलब्ध हो

2. अनुकूल लागत-लाभ

नए आगत की लागत से अधिक आय हो

3. जोखिम की स्वीकार्यता

किसान जोखिम उठाने में सक्षम हो

4. तकनीकी ज्ञान

किसान को तकनीक की जानकारी हो

5. वित्त की उपलब्धता

ऋण सुविधा उपलब्ध हो

 

  5.1.6 शुल्ज़ सिद्धांत की आलोचना

    केवल तकनीकी परिवर्तन पर जोरसंस्थागत बाधाओं (जमींदारी, जाति) की उपेक्षा

    किसान सदा 'तर्कसंगत' नहीं होतासामाजिक-सांस्कृतिक कारक प्रभावी होते हैं

    गरीब किसान नए आगत खरीदने में असमर्थपूँजी की समस्या

    बाज़ार की अपूर्णताओं को नज़रअंदाज़ किया

 

  5.2 बोसरप का सिद्धांत (Boserup's Theory)

परिचय:

ईस्टर बोसरप (Ester Boserup) — डेनिश अर्थशास्त्री एवं लेखिका। पुस्तक: "The Conditions of Agricultural Growth" (1965) मुख्य विचार: जनसंख्या वृद्धि कृषि विकास की बाधा नहीं, बल्कि प्रेरक शक्ति है। यह विचार माल्थस के विपरीत है।

 

  5.2.1 माल्थस बनाम बोसरप

आधार

माल्थस का मत

बोसरप का मत

जनसंख्या और खाद्य

खाद्य उत्पादन जनसंख्या से पीछे रहता है

जनसंख्या वृद्धि कृषि नवाचार को प्रेरित करती है

जनसंख्या का प्रभाव

नकारात्मक (संकट का कारण)

सकारात्मक (नवाचार का कारण)

नीति

जनसंख्या नियंत्रण

कृषि तकनीक विकास

उदाहरण

आयरलैंड का अकाल

एशिया में हरित क्रांति

 

  5.2.2 सिद्धांत की मुख्य बातें

    जनसंख्या बढ़ने से खाद्यान्न की माँग बढ़ती है

    बढ़ती माँग के जवाब में किसान नई तकनीक अपनाता है

    भूमि का गहन उपयोग (Intensification) होता है

    नई भूमि को खेती के अंतर्गत लाया जाता है

    सिंचाई, उर्वरक, यंत्रीकरण को अपनाया जाता है

 

  5.2.3 कृषि हल प्रणाली की अवस्थाएं (Farming Intensity Stages)

बोसरप ने भूमि के उपयोग की तीव्रता के आधार पर पाँच अवस्थाएं बताई हैं:

 

अवस्था

नाम

विशेषता

परती अवधि

1

वन परती (Forest Fallow)

20-25 वर्ष वन, फिर खेती

15-20 वर्ष

2

झाड़ी परती (Bush Fallow)

6-10 वर्ष झाड़ी, फिर खेती

6-10 वर्ष

3

घास परती (Short Fallow)

1-2 वर्ष घास उगने देना

1-2 वर्ष

4

वार्षिक फसल (Annual Cropping)

प्रति वर्ष एक फसल

कुछ माह

5

बहु-फसल (Multi-Cropping)

एक वर्ष में 2-3 फसलें

शून्य या न्यून

 

  5.2.4 जनसंख्या और कृषि परिवर्तन का संबंध

बोसरप के अनुसार जनसंख्या वृद्धि के साथ परती अवधि घटती जाती है और खेती तीव्र होती जाती है। यह एक सकारात्मक परिवर्तन है क्योंकि:

    भूमि उपयोग की दक्षता बढ़ती है

    नई तकनीक अपनाने की आवश्यकता पड़ती है

    उत्पादकता बढ़ती है

    श्रम का बेहतर उपयोग होता है

 

  5.2.5 बोसरप सिद्धांत की आलोचना

    जनसंख्या वृद्धि सदैव नवाचार नहीं लातीकभी-कभी संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है

    पर्यावरणीय क्षरण की उपेक्षाअधिक खेती से भूमि की उर्वरता घटती है

    तकनीकी नवाचार स्वतः नहीं होतानीति और निवेश आवश्यक

    माल्थस के खाद्य संकट के वास्तविक उदाहरणों को नज़रअंदाज़ करना

 

  5.3 शुल्ज़ और बोसरप की तुलना (Comparison)

 

आधार

शुल्ज़

बोसरप

वर्ष

1964

1965

राष्ट्रीयता

अमेरिकी (नोबेल 1979)

डेनिश

मुख्य विचार

नए आगत से विकास

जनसंख्या से नवाचार

किसान का चित्रण

तर्कसंगत, कुशल

अनुकूलनशील

विकास का कारण

तकनीकी परिवर्तन

जनसंख्या दबाव

माल्थस से संबंध

स्वतंत्र विचार

माल्थस के विरुद्ध

नीति सुझाव

तकनीकी निवेश

संसाधन प्रबंधन

सीमा

संस्थागत पहलू नज़रअंदाज़

पर्यावरण की उपेक्षा

 

  5.4 भारत के संदर्भ में दोनों सिद्धांतों की प्रासंगिकता

  शुल्ज़ का सिद्धांत:

    हरित क्रांति (1960-70) — HYV बीज, रासायनिक खाद, सिंचाई = नए आगत

    KVK, कृषि विश्वविद्यालय = मानव पूँजी निवेश

    PM-KISAN, किसान क्रेडिट कार्ड = वित्त सुविधा

  बोसरप का सिद्धांत:

    भारत में जनसंख्या वृद्धि के साथ बहु-फसलीय खेती में वृद्धि

    भूमि की कमी से ड्रिप सिंचाई, ग्रीन हाउस जैसी तीव्र तकनीक

    शहरी माँग बढ़ने से सब्जी, फल, डेयरी उत्पादन में वृद्धि

 

 

  इकाई-I का समग्र सारांश (Complete Summary)

 

विषय

मुख्य विद्वान

वर्ष

केंद्रीय विचार

नीति सुझाव

कृषि अर्थशास्त्र

Heady, Gray, Bishwanath

-

कृषि में अर्थशास्त्र के सिद्धांत लागू

किसान की आय-लागत विश्लेषण

अंतरक्षेत्रीय संबंध

Kuznets, Lewis

-

कृषि-उद्योग परस्पर निर्भर

समन्वित विकास नीति

मेलर सिद्धांत

J.W. Mellor

1966

3 अवस्थाएं: परंपरागतमिश्रितआधुनिक

तकनीक+संस्था+बाज़ार

फाई-रैनिस मॉडल

Fei & Ranis

1961

अतिरिक्त श्रम का उद्योग में स्थानांतरण

कृषि उत्पादकता+औद्योगीकरण

शुल्ज़ सिद्धांत

T.W. Schultz

1964

नए आगत + मानव पूँजी

HYV बीज, शिक्षा, प्रशिक्षण

बोसरप सिद्धांत

E. Boserup

1965

जनसंख्यानवाचार

संसाधन प्रबंधन, भूमि उपयोग

 

  परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण प्रश्न

 

  दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer — 10 अंक)

1.  कृषि अर्थशास्त्र की परिभाषा, प्रकृति, क्षेत्र और महत्व को विस्तारपूर्वक समझाइए।

2.  मेलर के कृषि विकास के सिद्धांत की व्याख्या कीजिए एवं उसकी आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए।

3.  फाई-रैनिस मॉडल की व्याख्या कीजिए। इस मॉडल में श्रम स्थानांतरण की तीन अवस्थाएं समझाइए।

4.  शुल्ज़ और बोसरप के कृषि विकास सिद्धांतों की तुलना कीजिए।

5.  कृषि के अंतरक्षेत्रीय संबंधों को उदाहरण सहित समझाइए।

 

  लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer — 5 अंक)

6.  कृषि अर्थशास्त्र की कोई दो परिभाषाएं दीजिए।

7.  'गरीब लेकिन कुशल' परिकल्पना क्या है? (शुल्ज़)

8.  बोसरप और माल्थस के विचारों में अंतर बताइए।

9.  अग्रवर्ती और पश्चवर्ती संबंध में अंतर।

10.मेलर की तीन अवस्थाओं के नाम लिखिए।

11.फाई-रैनिस मॉडल की मान्यताएं लिखिए।

12.वाणिज्यीकरण बिंदु (Commercialization Point) क्या है?

 

  वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQ)

13.कृषि अर्थशास्त्र किसकी शाखा है? — अर्थशास्त्र की

14.मेलर ने अपनी पुस्तक कब लिखी? — 1966

15.शुल्ज़ को नोबेल पुरस्कार कब मिला? — 1979

16.बोसरप की पुस्तक का नाम — The Conditions of Agricultural Growth

17.फाई-रैनिस मॉडल किसका विस्तार है? — Lewis Dual Sector Model

18.भारत में GDP में कृषि का योगदान लगभग — 16-18%

19.बोसरप के अनुसार कृषि विकास का कारणजनसंख्या वृद्धि

20.'वाणिज्यीकरण बिंदु' किस मॉडल से संबंधित है? — फाई-रैनिस

 

अध्ययन सुझाव:

प्रत्येक सिद्धांत की परिभाषा, मान्यताएं, विशेषताएं और आलोचना अलग-अलग याद करें।तुलनात्मक तालिकाएं परीक्षा में बहुत उपयोगी होती हैं।भारत के उदाहरण अवश्य जोड़ेंइससे उत्तर प्रभावशाली बनता है।मेलर, फाई-रैनिस, शुल्ज़, बोसरपचारों सिद्धांतकारों के नाम, वर्ष और पुस्तकें याद रखें।

 

 

 

तैयार कर्ता: अर्थशास्त्र विभाग  |  PM College of Excellence, अनूपपुर  |  शैक्षणिक सत्र 2024-25

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