आर्थिक समृद्धि का नैतिक आधार: ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और विश्वास- डॉ. अमित भूषण द्विवेदी
आर्थिक समृद्धि का नैतिक आधार: ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और विश्वास
डॉ. अमित भूषण द्विवेदीभारतीय अर्थव्यवस्था और उसके वृहद्-आर्थिक विकास की सफलता केवल राजकोषीय आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें समाज की नैतिकता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और विश्वास जैसी 'लघु बुनियादी' (Micro-foundations) बातों में गहराई से समाहित हैं। अर्थशास्त्र का एक महत्वपूर्ण सैद्धांतिक विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि कोई भी बाजार प्रणाली केवल स्वयं हित (Self-interest) के आधार पर दीर्घकालिक रूप से कार्य नहीं कर सकती, क्योंकि शुद्ध स्वार्थ सामाजिक सहयोग को सीमित कर देता है। विश्वास वह 'सामाजिक पूंजी' है जो समाज को जोड़ने वाले 'सीमेंट' की तरह काम करती है और आर्थिक लेनदेन को सुगम बनाती है,। जैसा कि फ्रांसिस फुकुयामा (1996) के साहित्य में भी उल्लेखित है, जिन राष्ट्रों ने नागरिकों के बीच गहरे विश्वास और सामाजिक सद्भाव का सृजन किया है, उन्होंने ही असाधारण आर्थिक समृद्धि प्राप्त की है। वास्तव में, दैनिक जीवन के कई आर्थिक अनुबंध अदालती कानूनी प्रक्रियाओं के बजाय व्यक्तिगत ईमानदारी और आपसी भरोसे पर टिके होते हैं, जिसके बिना एक विकसित बाजार का अस्तित्व संभव नहीं है।
आर्थिक विकास की गति को निर्धारित करने में सामाजिक मानदंड भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं, जो समय के साथ आर्थिक आदतों को बदलते हैं। जापान का ऐतिहासिक उदाहरण इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि कैसे 19वीं सदी की शुरुआत में समय के प्रति उदासीन रहने वाले समाज ने 'समय की पाबंदी' (Punctuality) को एक राष्ट्रीय मानदंड बनाया, जिसने उनकी अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर अनुशासित और गतिशील बनाया। इसके विपरीत, शासन और प्रशासन में सत्यनिष्ठा की कमी 'सक्रिय' और 'निष्क्रिय' बर्बादी (भ्रष्टाचार और निर्णय लेने में देरी) को जन्म देती है, जो विकास के मार्ग में बड़ी बाधा बनती है। आधुनिक शोध दर्शाते हैं कि जटिल नियमों और दंड के भय से उत्पन्न 'निर्णय लकवा' (Decision Paralysis) कभी-कभी प्रत्यक्ष भ्रष्टाचार से भी अधिक आर्थिक क्षति पहुँचाता है, क्योंकि यह अधिकारियों को जोखिम लेने से रोकता है। इसलिए, एक सक्षम अर्थव्यवस्था के लिए स्वायत्तता और नैतिक विवेक को कठोर एवं बोझिल नियमों की तुलना में अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए,।
अंततः, अर्थशास्त्र का वास्तविक उद्देश्य केवल धन संचय नहीं, बल्कि मानव कल्याण और समावेशी विकास में निहित है, जिसका आकलन महात्मा गांधी के सिद्धांतों के अनुसार समाज के सबसे गरीब व्यक्ति के जीवन स्तर से होना चाहिए,। भारत का खाद्य सुरक्षा कानून इसी बुनियादी नैतिक सिद्धांत पर आधारित है कि एक सभ्य राष्ट्र में भोजन प्रत्येक नागरिक का अधिकार है, न कि केवल उपभोग का एक साधन। जब समाज में ईमानदारी और सत्यनिष्ठा एक व्यवहारिक मानदंड बन जाते हैं, तो यह न केवल भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाता है बल्कि वैश्विक स्तर पर राष्ट्र की 'संप्रभु रेटिंग' (Sovereign Ratings) में भी सुधार करता है,। निष्कर्षतः, सुदृढ़ आर्थिक विकास के लिए उन सामाजिक गुणों का विकास अनिवार्य है जो सूक्ष्म स्तर पर मानवीय व्यवहार को संचालित करते हैं, क्योंकि दोषपूर्ण 'लघु-बुनियादें' बड़े से बड़े 'वृहद्-उद्देश्यों' को विफल करने की क्षमता रखती हैं।
डॉ. अमित भूषण द्विवेदी, प्रधानमन्त्री उत्कृष्ट महाविद्यालय, शासकीय तुलसी महाविद्यालय, अनूपपुर में अर्थशास्त्र विषय के सहायक प्राध्यापक है.
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