सत्य, दर्शन और अनुभव — डॉ. अमित भूषण द्विवेदी
जब हम किसी महापुरुष के मुख से सुनते हैं कि उन्हें ईश्वर के साक्षात दर्शन हुए, तो हमारे मन में दो प्रतिक्रियाएँ स्वाभाविक रूप से उठती हैं — श्रद्धा और संशय। और शायद यही दोनों मिलकर मनुष्य को सच्चे अर्थों में जिज्ञासु बनाते हैं। परमहंस योगानंद जी ने अपनी अमर कृति "एक योगी की आत्मकथा" में भगवान श्रीकृष्ण के साक्षात दर्शन का वर्णन किया है। प्रेमानंद महाराज ने काशी के घाट पर भगवान शंकर के बालरूप दर्शन की बात कही है। रामभद्राचार्य जी ने प्रभु श्रीराम के दर्शन का उल्लेख किया है। पूज्य शंकराचार्य की सभाओं में अदृश्य दिव्य उपस्थिति की बात कही जाती है। अब प्रश्न यह उठता है — इन सबको हम किस तराजू पर तौलें? प्रमाण एक सामाजिक उपकरण है। वह वहाँ तक काम करता है जहाँ तक दो या दो से अधिक लोगों की सहमति बन सके। किंतु आत्मिक अनुभव तो परम एकांत की घटना है — वहाँ कोई गवाह नहीं होता, कोई कैमरा नहीं होता। जब योगानंद जी ने समाधि में कृष्ण को देखा, तब वह अनुभव उनका था — उतना ही सच, जितना किसी के लिए प्रेम में पहली बार हृदय का धड़कना सच होता है। इसीलिए किसी की आस्था को प्रमाण-पत्र देना या न देना — दोनों ही अहंकार के कार्य हैं। हम किसी के भीतरी अनुभव के न्यायाधीश नहीं हो सकते। भारतीय दर्शन इस प्रश्न से हजारों वर्षों से जूझता रहा है। अद्वैत वेदांत कहता है — "ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या" — अर्थात जो दिख रहा है वह माया है, जो है वह अदृश्य है। जैन दर्शन का स्याद्वाद कहता है कि सत्य अनेकांत है — हर दृष्टिकोण उसका एक अंश मात्र है। बौद्ध दर्शन कहता है — सब कुछ अनित्य है, कोई भी सत्य स्थायी नहीं। तीनों महान परंपराएँ एक ही निष्कर्ष पर आती हैं — निरपेक्ष सत्य मनुष्य की बुद्धि की पकड़ से परे है। फिर हम जो सत्य जानते हैं, वह क्या है? वह है — हमारा अनुभव, हमारी क्षमता, हमारा दृष्टिकोण और हमारा उद्देश्य। इसीलिए एक ही घटना को दो व्यक्ति दो भिन्न रूपों में देखते हैं, और दोनों गलत नहीं होते। कहावत थी — "बबूल बोओगे तो आम कहाँ से पाओगे?" यह नीति की बात थी, कर्म-फल की बात थी। किंतु आज कलम बांधने के युग ने इसे शाब्दिक अर्थ में भी झूठा साबित कर दिया। बबूल पर आम लग सकता है। यह केवल कृषि विज्ञान की उपलब्धि नहीं है। यह एक गहरा दार्शनिक संदेश है — जो आज असंभव दिखता है, वह कल का सत्य हो सकता है। तो जो महापुरुष कहते हैं कि उन्होंने ईश्वर को देखा — क्या यह असंभव है? जब चेतना की गहराइयाँ अभी पूरी तरह मानवजाति को ज्ञात ही नहीं हुईं, तो असंभव कहने का साहस हम कहाँ से लाएँ? हम सब अपनी योग्यता, क्षमता, संस्कार और उद्देश्य के अनुसार सत्य को देखते हैं। कोई तर्क से देखता है, कोई श्रद्धा से, कोई विज्ञान से, कोई अनुभव से। इनमें से कोई एक पूर्ण नहीं है। शायद सत्य कोई मंजिल नहीं, एक यात्रा है। और उस यात्रा में जो जितना गहरे उतरा, उसे उतना ही अधिक दिखा। बबूल पर आम लगाने वाले ने प्रकृति को नहीं बदला — उसने अपनी दृष्टि बदली। और शायद ईश्वर-दर्शन भी यही है — दृष्टि का वह परिवर्तन, जहाँ सब कुछ एक ही प्रकाश में दिखने लगता है।
डॉ. अमित भूषण द्विवेदी, प्रधानमन्त्री उत्कृष्ट महाविद्यालय, शासकीय तुलसी महाविद्यालय, अनूपपुर में अर्थशास्त्र विषय के सहायक प्राध्यापक है.
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