कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भारत का भविष्य—संकट नहीं, अवसर की नई सुबह-डॉ. अमित भूषण द्विवेदी

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भारत का भविष्य—संकट नहीं, अवसर की नई सुबह-डॉ. अमित भूषण द्विवेदी

क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारी नौकरियाँ छीन लेगी, या भारत को नई आर्थिक ऊँचाइयों तक ले जाएगी? यह सवाल आज केवल तकनीकी बहस का विषय नहीं, बल्कि नीति-निर्माण और समाज दोनों के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है और इस परिवर्तन को समझना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

मैकिन्से की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 तक 88 प्रतिशत संगठन अपने किसी न किसी व्यावसायिक कार्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग कर रहे हैं, जबकि 2022 में यह आँकड़ा केवल 50 प्रतिशत था। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि व्यवसाय करने के तरीके में एक बुनियादी बदलाव का संकेत है। विश्व बैंक की 2025 की डिजिटल प्रगति रिपोर्ट बताती है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग अभी भी उच्च-आय वाले देशों में केन्द्रित है जो कुल उपयोग का 58.4 प्रतिशत है, परंतु भारत जैसे मध्यम-आय वाले देशों में भी इसका विस्तार तेजी से हो रहा है। यह भारत के लिए एक बड़ा अवसर है—यदि इसे सही दिशा में अपनाया जाए।

भारत के संदर्भ में सबसे बड़ी चिंता रोजगार को लेकर है। सेवाक्षेत्र पर आधारित हमारी अर्थव्यवस्था में बड़ी संख्या में नौकरियाँ ऐसे कार्यों से जुड़ी हैं जिन्हें कृत्रिम बुद्धिमत्ता आसानी से स्वचालित कर सकती है। इससे यह आशंका स्वाभाविक है कि आने वाले वर्षों में रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं। लेकिन सभी अध्ययन इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचते। ब्रायन्जोल्फसन, चंदर और चेन के 2025 के शोध के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उच्च संपर्क वाले व्यवसायों और कम संपर्क वाले व्यवसायों के बीच रोजगार संभावनाओं में अंतर अपेक्षाकृत कम है, जो अल्पकाल में श्रम बाजार पर इसके सीमित प्रभाव को दर्शाता है। येल बजट प्रयोगशाला के गिम्बेल और अन्य के 2025 के अध्ययन के अनुसार अमेरिका के व्यापक श्रम बाजार में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण कोई स्पष्ट व्यवधान नहीं देखा गया है, जो श्रम-प्रचुर अर्थव्यवस्थाओं जैसे भारत के लिए अल्पकालिक आश्वासन प्रदान करता है।

रेनॉल्ट के 2025 में डेनमार्क के श्रम बाजार पर किए गए अध्ययन में यह पाया गया कि अधिकांश डेनिश कामगार कृत्रिम बुद्धिमत्ता अपनाने से लाभान्वित हो रहे हैं, जो यह संकेत देता है कि यह तकनीक प्रारंभिक चरण में श्रम का पूरक बन सकती है, न कि प्रतिस्थापक। इतिहास भी हमें संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की सलाह देता है। औद्योगिक क्रांति से लेकर डिजिटल युग तक, हर तकनीकी बदलाव ने शुरुआत में रोजगार को प्रभावित किया, लेकिन समय के साथ नए अवसर भी पैदा किए। बेसेन ने 2019 में यह स्थापित किया कि उत्पादकता बढ़ाने वाली प्रौद्योगिकियाँ प्रारम्भिक चरण में लोचदार माँग वाले क्षेत्रों में श्रम की पूरक होती हैं, न कि प्रतिस्थापक। यह निष्कर्ष भारत के कृत्रिम बुद्धिमत्ता-श्रम समीकरण को समझने में उपयोगी है।

अल्बानेसी और अन्य ने 2024 में यूरोप के आँकड़ों का उपयोग करते हुए दिखाया कि नई प्रौद्योगिकियाँ प्रारंभिक अपनाने के चरण में रोजगार बढ़ा सकती हैं, हालाँकि दीर्घकाल में संरचनात्मक परिवर्तन अवश्यंभावी हैं। लियू और अन्य के 2025 में दो शताब्दियों के तकनीकी परिवर्तन पर आधारित अनुभवजन्य शोध के अनुसार श्रम बाजार पर नई प्रौद्योगिकियों का प्रभाव न तो एकसमान होता है और न ही पूर्वनिर्धारित, बल्कि यह कौशल, कार्यों और संस्थाओं के सह-विकास पर निर्भर करता है। यहीं पर संस्थागत ढाँचे की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रभाव को सकारात्मक दिशा देने के लिए तीन प्रकार के संस्थानों की आवश्यकता है। पहले, सक्षमकारी संस्थान जो कार्यबल को नए कौशल प्रदान करते हैं और उन्हें इस नए युग के लिए तैयार करते हैं। दूसरे, सुरक्षा प्रदान करने वाले संस्थान जो संक्रमण काल में सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। और तीसरे, मार्गदर्शक संस्थान जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग को नैतिक और उत्तरदायी बनाते हैं। भारत में इन तीनों स्तंभों को सुदृढ़ करना समय की माँग है। इन संस्थानों की मजबूती ही यह तय करेगी कि इस तकनीक का प्रभाव सकारात्मक होगा या नकारात्मक।

फिर भी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर अंधा आशावाद उचित नहीं होगा। इस तकनीक की अपनी सीमाएँ हैं। यह अभी पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है, इसके लिए भारी संसाधनों की आवश्यकता होती है, और यह आँकड़ों पर अत्यधिक निर्भर है। कोस्मीना और अन्य ने मैसाचुसेट्स प्रौद्योगिकी संस्थान में 2025 में तथा ली और अन्य ने माइक्रोसॉफ्ट में किए गए दोनों स्वतंत्र अध्ययनों में पाया कि निबंध लेखन जैसे रचनात्मक कार्यों के लिए उत्पादक कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर निर्भरता संज्ञानात्मक क्षमता में गिरावट और आलोचनात्मक सोच के कमजोर होने का कारण बन रही है। चेंग और अन्य के 2025 के अध्ययन के अनुसार व्यापक रूप से तैनात मॉडलों में 'सामाजिक चापलूसी' की प्रवृत्ति पाई गई है जो उपयोगकर्ताओं की गलत धारणाओं को भी अनावश्यक रूप से सत्यापित करती है। इससे उपयोगकर्ताओं की इस तकनीक पर निर्भरता बढ़ती है और सुधारात्मक व्यवहार की प्रवृत्ति घटती है।

भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण पहलू आँकड़ों की विविधता और प्रामाणिकता है। विलालोबोस और अन्य ने 2024 में चेतावनी दी है कि मानव-निर्मित आँकड़ों का भण्डार शीघ्र ही समाप्त होने की कगार पर है और कृत्रिम आँकड़ों पर प्रशिक्षित मॉडल ध्वस्त हो जाते हैं। शुमाइलोव और अन्य ने नेचर पत्रिका में 2024 में प्रमाणित किया कि पुनरावर्ती रूप से उत्पन्न कृत्रिम आँकड़ों पर प्रशिक्षित होने पर मॉडल का प्रदर्शन क्रमशः गिरता है। इससे मानव-निर्मित प्रामाणिक आँकड़ों की दीर्घकालिक उपयोगिता सिद्ध होती है। यह भारत के विविध और विशाल घरेलू आँकड़ा स्रोतों की रणनीतिक महत्ता को और बढ़ा देता है। भारत के पास विशाल और विविध मानव-निर्मित आँकड़ा स्रोत हैं, जो उसे वैश्विक परिदृश्य में एक विशिष्ट बढ़त प्रदान कर सकते हैं।

इस संदर्भ में बेलकाक और अन्य का 2025 का शोध विशेष रूप से प्रासंगिक है, जिसमें तर्क दिया गया है कि छोटे भाषा मॉडल एजेंटिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य हैं। ये मॉडल संसाधन-सीमित परिवेश में भी प्रभावी ढंग से कार्य कर सकते हैं, जो भारत की अवसंरचनागत वास्तविकताओं के साथ अधिक संगत है। यह दृष्टिकोण भारत को केवल तकनीक के उपभोक्ता के बजाय एक नवाचारी के रूप में स्थापित कर सकता है।

नारायणन और कपूर ने 2025 में तर्क दिया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को एक सामान्य प्रौद्योगिकी के रूप में देखा जाना चाहिए और इसकी शासन व्यवस्था में मजबूत सूचनादाता सुरक्षा तंत्र अनिवार्य है, क्योंकि संभावित खतरनाक अनुप्रयोगों की जानकारी केवल आंतरिक लोगों को ही होती है। यह नैतिक और पारदर्शी शासन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। भारत में इस तकनीक के उपयोग के कई सकारात्मक उदाहरण सामने आ रहे हैं—कृषि में तकनीक-आधारित मौसम पूर्वानुमान, स्वास्थ्य सेवाओं में रोग निदान, और शिक्षा में व्यक्तिगत शिक्षण मॉडल। ये उदाहरण दिखाते हैं कि यदि सही नीति और प्रशिक्षण के साथ इसे अपनाया जाए, तो यह रोजगार सृजन और उत्पादकता वृद्धि दोनों में सहायक हो सकती है।

रेस्त्रेपो ने 2025 में एक सशंकित दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता संज्ञानात्मक श्रम की आर्थिक प्रासंगिकता को प्रगतिशील रूप से क्षीण कर सकती है। परंतु एक वैकल्पिक विश्लेषण इसे एक सशक्त पोत के रूप में देखता है जिसे संचालन के लिए एक दक्ष कप्तान की आवश्यकता होती है। भारत के लिए यही दृष्टिकोण उपयुक्त है—इस तकनीक को प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग के रूप में देखना। भारत की ताकत उसकी युवा जनसंख्या, विविध आँकड़े और सेवाक्षेत्र में निहित है। इनका सही उपयोग करके इसे रोजगार सृजन का माध्यम बनाया जा सकता है।

इसके लिए सबसे जरूरी है—मानव पूंजी में निवेश। शिक्षा और कौशल विकास को इस तरह पुनर्गठित करना होगा कि लोग केवल तकनीक का उपयोग ही न करें, बल्कि उसके साथ सोचने और निर्णय लेने की क्षमता भी विकसित करें। साथ ही, मजबूत संस्थागत ढाँचा तैयार करना होगा जो इस परिवर्तन के दौरान लोगों को सुरक्षा प्रदान करे और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग को नैतिक दिशा दे। भारत की रणनीति को अन्य देशों की नकल करने के बजाय अपनी आर्थिक वास्तविकताओं, मानव पूँजी की शक्ति, आँकड़ों की विविधता तथा संसाधन सीमाओं के अनुरूप एक जमीनी स्तर से ऊपर की ओर, क्षेत्र-विशिष्ट एवं समावेशी दृष्टिकोण पर आधारित होना चाहिए।

अंततः, कृत्रिम बुद्धिमत्ता न तो अपने आप में संकट है और न ही कोई जादुई समाधान। यह एक परिवर्तनकारी शक्ति है, जिसका परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि समाज, सरकार और संस्थान इसे किस प्रकार दिशा देते हैं। यदि भारत शिक्षा, कौशल विकास और नैतिक शासन पर ध्यान केंद्रित करे, तो यह तकनीक न केवल रोजगार सृजन का माध्यम बनेगी, बल्कि समावेशी और सतत विकास का आधार भी सिद्ध होगी। भारत के पास अभी समय और अवसर दोनों हैं। यदि सही नीतियाँ और दूरदृष्टि अपनाई जाए, तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल रोजगार की प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि विकास का सबसे बड़ा सहायक बन सकती है। क्योंकि भविष्य मशीनें नहीं तय करेंगी—उसे दिशा देने वाले हमारे निर्णय होंगे। यह संकट नहीं, अवसर की नई सुबह है।

डॉ. अमित भूषण द्विवेदी, प्रधानमन्त्री उत्कृष्ट महाविद्यालय, शासकीय तुलसी महाविद्यालय, अनूपपुर में अर्थशास्त्र विषय के सहायक प्राध्यापक है.

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