भारतीय ज्ञान परंपरा और एक रोचक मूल्यांकन पद्धति तथा विरोध के स्वर- डॉ. अमित भूषण द्विवेदी
कैलाश पर एक अनोखी प्रतिस्पर्धा हुई, ब्रह्मांड की परिक्रमा का दांव। एक ओर तेज, शक्तिशाली कार्तिकेय मोर पर सवार थे। दूसरी ओर स्थूलकाय गणेश धीमे चूहे पर सवार थे। परिणाम तो पहले से तय लग रहा था। कार्तिकेय उड़ चले, ब्रह्मांड नापते गए और अपने परिश्रम, गति और साहस से विजयी होकर लौटे। गणेश रुके, सोचा, और माता-पिता की परिक्रमा कर ली। दोनों ने अपने-अपने तर्क से जीत हासिल की थी। किंतु माता-पिता का निर्णय था कि जो सृष्टि के मूल की परिक्रमा कर ले, वही विजेता है। इस दर्शन से गणेश को विजयी घोषित किया गया।
आज के खेल सिद्धांत कहते हैं कि एक बार खेल शुरू होने के बाद नियम नहीं बदले जा सकते। किंतु यहाँ मामला केवल खेल का नहीं था। यह माता-पिता का अपने दो असमान संतानों के बीच का निर्णय था, जहाँ एक की जीत भौतिक रूप से असंभव थी। इसलिए माता-पिता ने मूल्यांकन की पद्धति बदल दी। उन्होंने गति नहीं देखी, दूरी नहीं नापी, बल्कि विवेक परखा। यह केवल कमज़ोर बच्चे को जिताने के लिए नहीं था, यह दोनों को उनकी श्रेष्ठतम संभावना तक पहुँचाने के लिए था।
और परिणाम देखिए। गणेश माता-पिता के साथ रहे, रिद्धि-सिद्धि से विवाह हुआ और उत्तर भारत में हर शुभ कार्य के प्रथम पूज्य देव हुए। कार्तिकेय इस निर्णय से असंतुष्ट होकर दक्षिण की ओर गए, ऋषि अगस्त्य से शिक्षा ग्रहण की, देवसेनापति बने और दक्षिण भारत में मुरुगन के रूप में सर्वोच्च पूजनीय हुए। एक मूल्यांकन पद्धति ने दो अलग-अलग पथ बनाए, दोनों महान, दोनों पूर्ण।
यहाँ सबसे गहरी बात यह है कि कार्तिकेय का विरोध व्यर्थ नहीं गया। उनकी असहमति, उनका दक्षिण प्रस्थान यह पराजय नहीं थी, बल्कि एक नई यात्रा का आरंभ था। विरोध के उस स्वर ने उन्हें अगस्त्य जैसे महाऋषि के सान्निध्य तक पहुँचाया, एक समृद्ध सभ्यता का नायक बनाया। जो असुविधाजनक लगा, वही उन्नति का मार्ग बन गया।
सीख यह है कि जब प्रतिस्पर्धी असमान हों, तो मूल्यांकन की पद्धति बदलकर दोनों को श्रेष्ठतम संभावना का अवसर दिया जा सकता है। और विरोध के स्वर, भले कितने भी कटु हों, कभी-कभी नई नियति का निर्माण कर देते हैं।
डॉ. अमित भूषण द्विवेदी, प्रधानमन्त्री उत्कृष्ट महाविद्यालय, शासकीय तुलसी महाविद्यालय, अनूपपुर में अर्थशास्त्र विषय के सहायक प्राध्यापक है.
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