AI, सोशल मीडिया पर गुमराह करने वाली खबरें तथा भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रमाण- डॉ. अमित भूषण द्विवेदी
AI, सोशल मीडिया पर गुमराह करने वाली खबरें तथा भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रमाण
डॉ. अमित भूषण द्विवेदीआज के डिजिटल युग में उपभोक्ताओं के स्तर पर AI के उपयोग का प्रचलन तेजी से बढ़ा है। विकसित राष्ट्रों में परंपरागत तरीकों से समृद्धि के अवसर सीमित होते जा रहे हैं और AI अनुसंधान सहित जीवन के सभी क्षेत्रों में एक सशक्त विकल्प बनकर उभर रहा है। इस तकनीक में जहाँ विकसित राष्ट्रों के और तेजी से आगे बढ़ने की संभावनाएं छुपी हुई हैं, वहीं विकासशील एवं अल्पविकसित राष्ट्रों में भी नए बाजार बनने तथा अर्थव्यवस्था को कम लागत पर रूपांतरित करने की संभावना स्पष्ट दिखती है।
परंतु इस तकनीक का एक दूसरा पहलू भी है। AI ने सोशल मीडिया पर भ्रामक सूचनाओं और भ्रम को भी तेजी से फैलाया है। ऐसे में बिना जल्दबाजी किए सत्य और असत्य के बीच अंतर करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है। इस चुनौती से निपटने के लिए हमें किसी नई पद्धति की नहीं, बल्कि अपनी ही भारतीय दार्शनिक परंपरा की ओर लौटने की आवश्यकता है, जिसमें सत्य की परख के लिए चार सुदृढ़ प्रमाण पहले से ही निर्धारित किए गए हैं।
भारतीय दार्शनिक परंपरा में मुख्य रूप से तीन और कुल चार प्रकार के प्रमाण बताए गए हैं। पहला है प्रत्यक्ष प्रमाण — जो इंद्रियों द्वारा सीधे अनुभव किया जाए, जैसे आँखों से देखना और कानों से सुनना। इसमें कार्य और कारण के बीच सीधा एवं प्रत्यक्ष संबंध होता है। दूसरा है अनुमान प्रमाण — जिसमें कार्य और कारण का संबंध प्रत्यक्ष नहीं होता, बल्कि किसी चिह्न या संकेत के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाता है, जैसे कहीं धुआँ देखकर यह अनुमान करना कि संभवतः वहाँ आग लगी होगी। तीसरा है **शब्द प्रमाण** अर्थात आगम या आप्त वचन — जिसमें कार्य और कारण के बीच संबंध न तो प्रत्यक्ष होता है और न ही अनुमान किया जा सकता है, ऐसी स्थिति में किसी विश्वसनीय एवं विद्वान व्यक्ति के वचन अथवा शास्त्र वचन को प्रमाण माना जाता है। न्याय दर्शन के प्रणेता गौतम मुनि ने इन तीनों प्रमाणों को स्वीकार किया है। इनके अतिरिक्त चौथा प्रमाण है उपमान अर्थात तुलना — जिसमें किसी तथ्य की सत्यता की जाँच तुलनात्मक विश्लेषण के आधार पर की जाती है।
इन चारों प्रमाणों को सोशल मीडिया के संदर्भ में समझें तो — जब कोई समाचार आए तो पहले यह देखें कि क्या यह प्रत्यक्ष रूप से सत्यापित है? यदि नहीं, तो उपलब्ध संकेतों के आधार पर अनुमान करें। किसी विश्वसनीय एवं जानकार व्यक्ति के वचन को भी कसौटी पर कसें और अंत में तुलना के माध्यम से जाँचें कि मीडिया, BBC अथवा किसी प्रत्यक्षदर्शी के विभिन्न वक्तव्यों में परस्पर कितनी संगति है।
आँख मूँदकर भरोसा करने के स्थान पर भारतीय ज्ञान परंपरा के ये चार प्रमाण — प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द और उपमान — आज के भ्रामक सूचना के युग में हम सबके लिए एक विश्वसनीय पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभा सकते हैं।
डॉ. अमित भूषण द्विवेदी, प्रधानमन्त्री उत्कृष्ट महाविद्यालय, शासकीय तुलसी महाविद्यालय, अनूपपुर में अर्थशास्त्र विषय के सहायक प्राध्यापक है.
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