विकसित भारत 2047: नवप्रवर्तन, रचनात्मकता और आत्मनिर्भरता का युग-डॉ. अमित भूषण द्विवेदी
विकसित भारत 2047: नवप्रवर्तन, रचनात्मकता और आत्मनिर्भरता का युग-डॉ. अमित भूषण द्विवेदी
भारत जब अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर है, तब “विकसित भारत 2047” का लक्ष्य केवल आर्थिक प्रगति का नहीं, बल्कि एक बौद्धिक, तकनीकी और रचनात्मक पुनर्जागरण का प्रतीक बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने पिछले एक दशक में जिस गति से नवाचार, उद्यमिता और आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, वह इस विज़न की ठोस नींव रखता है। “स्टार्टअप इंडिया”, “मेक इन इंडिया”, “डिजिटल इंडिया”, “आत्मनिर्भर भारत अभियान”, “स्किल इंडिया” और “अटल इनोवेशन मिशन” जैसी पहलें इस बात का प्रमाण हैं कि भारत अब केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि सृजनकर्ता राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जोसेफ शुम्पीटर ने कहा था कि आर्थिक विकास “रचनात्मक विनाश” (Creative Destruction) की प्रक्रिया से संचालित होता है, जहाँ नए विचार पुराने ढाँचों को प्रतिस्थापित करते हैं। यही सिद्धांत आज भारत की विकास यात्रा में दिखाई देता है। पारंपरिक ढाँचों को आधुनिक तकनीक और नवाचार से बदलते हुए भारत ने कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और डिजिटल शासन के क्षेत्रों में नई ऊँचाइयाँ हासिल की हैं। प्रधानमंत्री मोदी का “वोकल फॉर लोकल” और “वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट” अभियान स्थानीय नवाचार को वैश्विक पहचान देने का माध्यम बना है।
नवप्रवर्तन के चार स्तंभ—जिज्ञासा, रचनात्मकता, जोखिम उठाना और सहयोग—विकसित भारत की आधारशिला हैं। जिज्ञासा वह शक्ति है जो “क्यों?” पूछने की प्रेरणा देती है और स्थापित मान्यताओं को चुनौती देती है। कार्यस्थल पर जिज्ञासा में वृद्धि रचनात्मक परिणामों को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकती है। रचनात्मकता का अर्थ केवल कल्पनाशील होना नहीं, बल्कि असंबद्ध विचारों को जोड़कर उपयोगी समाधान बनाना है। भारत जैसे विविध देश में यह क्षमता स्थानीय और वैश्विक दोनों स्तरों पर प्रभावी समाधान प्रस्तुत कर सकती है। जोखिम उठाने का साहस नवाचार की आत्मा है। “स्मार्ट रिस्क” का अर्थ है—लक्ष्य स्पष्ट रखना, संसाधनों का यथार्थ मूल्यांकन करना और असफलता को सीखने का अवसर मानना। सहयोग वह शक्ति है जो सामूहिक मेधा को एक दिशा देती है। “यस, एंड...” जैसी सकारात्मक सोच से ही नए विचारों का विस्तार होता है और विविध क्षमताओं का समन्वय संभव होता है।
आज भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी स्टार्टअप इकोनॉमी बन चुका है। 100 से अधिक यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स, लाखों उद्यमियों और करोड़ों डिजिटल उपभोक्ताओं के साथ भारत नवाचार का वैश्विक केंद्र बन रहा है। “स्टार्टअप इंडिया” और “स्टैंडअप इंडिया” जैसी योजनाओं ने युवाओं को जोखिम लेने और अपने विचारों को व्यवसाय में बदलने का अवसर दिया है। “डिजिटल इंडिया” ने नवाचार को गाँव-गाँव तक पहुँचाया है, जबकि “गति शक्ति”, “राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020” और “नेशनल रिसर्च फाउंडेशन” ने अनुसंधान और कौशल विकास को नई दिशा दी है। प्रधानमंत्री मोदी का “विज्ञान से विकास” का मंत्र इस बात को रेखांकित करता है कि विज्ञान, तकनीक और रचनात्मकता ही भारत को “विश्वगुरु” बनाने की वास्तविक शक्ति हैं।
भारत की डिजिटल क्रांति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल भुगतान तंत्र बना दिया है। CoWIN प्लेटफ़ॉर्म ने महामारी के दौरान तकनीक आधारित शासन की क्षमता को सिद्ध किया। अटल इनोवेशन मिशन के तहत देशभर में हजारों अटल टिंकरिंग लैब्स स्थापित की गई हैं, जहाँ स्कूली छात्र नवाचार और प्रयोग की संस्कृति सीख रहे हैं। प्रधानमंत्री रिसर्च फेलोशिप और NITI Aayog की पहलें युवाओं को अनुसंधान और उद्यमिता के लिए प्रेरित कर रही हैं।
हालाँकि चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। कार्यस्थलों पर जिज्ञासा को दबाने की प्रवृत्ति, असफलता के भय और “हमारे पास समय नहीं” जैसी मानसिकता नवाचार की गति को धीमा करती है। इन बाधाओं को दूर करने के लिए शिक्षा प्रणाली में प्रयोगशीलता, संवाद और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देना आवश्यक है। नई शिक्षा नीति इस दिशा में एक बड़ा कदम है, जो विद्यार्थियों को केवल ज्ञान नहीं, बल्कि सृजन की क्षमता भी प्रदान करती है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत की स्थिति विशिष्ट है। अमेरिका और चीन जैसे देशों ने नवाचार को अपनी आर्थिक रणनीति का केंद्र बनाया है, परंतु भारत की ताकत उसकी जनसंख्या, विविधता और लोकतांत्रिक ऊर्जा में निहित है। यह वह देश है जहाँ परंपरा और तकनीक साथ-साथ चल सकते हैं। यही भारत को “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य तक पहुँचाने की सबसे बड़ी पूँजी है।
विकसित भारत 2047 का सपना तभी साकार होगा जब नवप्रवर्तन को केवल प्रयोगशालाओं या नीतिगत दस्तावेज़ों तक सीमित न रखकर, हर नागरिक के दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया जाए। जिज्ञासा, रचनात्मकता, जोखिम और सहयोग—ये चार स्तंभ भारत को आत्मनिर्भर और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में अग्रसर करेंगे। विकसित भारत @ 2047 केवल आर्थिक समृद्धि का लक्ष्य नहीं, बल्कि एक रचनात्मक क्रांति का आह्वान है। यदि भारत शुम्पीटर के सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में अपनाकर नवप्रवर्तन को अपनी संस्कृति का मूल बना ले, तो वह न केवल विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बनेगा, बल्कि ज्ञान, विज्ञान और सृजनशीलता का केंद्र भी होगा। यही वह भारत होगा—जो विचारों से विकसित, नवाचार से सशक्त और रचनात्मकता से विश्वगुरु बने.
डॉ. अमित भूषण द्विवेदी, प्रधानमन्त्री उत्कृष्ट महाविद्यालय, शासकीय तुलसी महाविद्यालय, अनूपपुर में अर्थशास्त्र विषय के सहायक प्राध्यापक है.
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